नयी दिल्ली, सात जुलाई (भाषा) दिल्ली की एक अदालत ने मंगलवार को कहा कि हिरासत में यातना, कानून के शासन पर सबसे गंभीर हमलों में से एक है।
अदालत ने नकली दवा बनाने वाले गिरोह की जांच से जुड़े तीन करोड़ रुपये के रिश्वत मामले में एक आरोपी को सीबीआई द्वारा कथित रूप से प्रताड़ित किए जाने के आरोपों की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच का निर्देश देते हुए यह टिप्पणी की।
अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि हिरासत में यातना के आरोप, खासकर जब वे देश की प्रमुख जांच एजेंसी के अधिकारियों के खिलाफ लगाए गए हों, अनुत्तरित नहीं छोड़े जा सकते।
अदालत ने निर्देश दिया कि यदि जांच में कोई आपराधिक कृत्य या विभागीय कदाचार सामने आता है, तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ सख्त आपराधिक और विभागीय कार्रवाई की जाए।
विशेष न्यायाधीश सुशांत चांगोत्रा, सह-आरोपी प्रभात कुमार (कपूर) की याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। यह याचिका उनके अधिवक्ता प्रतीक सोम के मार्फत दायर की गई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि 16 से 22 जून तक सीबीआई हिरासत के दौरान उन्हें बुरी तरह पीटा गया, जिससे उनके बाएं कान और बाईं जांघ पर गंभीर चोटें आईं।
अदालत ने कहा कि 19 जून का ‘चिकत्सकीय-विधिक मामला’ (एमएलसी) रिपोर्ट, जिसमें बाईं जांघ पर चोट के निशान दर्ज का उल्लेख था, और 20 जून की रिपोर्ट, जिसमें बाएं कान में खून के थक्के और सूजन/रक्त के थक्के का उल्लेख था, प्रथम दृष्टया यह स्थापित करती हैं कि कुमार को सीबीआई अधिकारियों की विशेष हिरासत के दौरान शारीरिक चोटें आईं।
न्यायाधीश ने कहा, ‘‘अदालत का मानना है कि मामले की सीबीआई के उच्चतम स्तर पर जांच करने की जरूरत है।’’ अदालत ने संबंधित जेल अधीक्षक को निर्देश दिया कि कुमार की सफदरजंग अस्पताल में चिकित्सकीय जांच कराई जाए और उन्हें आवश्यक उपचार उपलब्ध कराया जाए।’’
न्यायाधीश ने कहा, ‘‘इस आदेश की एक प्रति तत्काल सीबीआई निदेशक को आवश्यक कार्रवाई के लिए भेजी जाए। उम्मीद की जाती है कि हिरासत में हिंसा के आरोपों के संबंध में दिए गए इन निर्देशों के अनुपालन में की जाने वाली कार्रवाई की रिपोर्ट दो सप्ताह के भीतर अदालत में दाखिल की जाएगी।’’
भाषा सुभाष माधव
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