दुर्लभ रोगों के मरीजों के लिए निरंतर ‘‘एंजाइम रिप्लेसमेंट थेरेपी’’ की राज्यसभा में की गई मांग

Ads

दुर्लभ रोगों के मरीजों के लिए निरंतर ‘‘एंजाइम रिप्लेसमेंट थेरेपी’’ की राज्यसभा में की गई मांग

  •  
  • Publish Date - February 6, 2026 / 03:13 PM IST,
    Updated On - February 6, 2026 / 03:13 PM IST

नयी दिल्ली, छह फरवरी (भाषा) राज्यसभा में शुक्रवार को भारतीय जनता पार्टी के डॉ अनिल सुखदेवराव बोंडे ने ‘लाइसोसोमल स्टोरेज डिसऑर्डर’ कहलाने वाली दुर्लभ बीमारियों के इलाज के लिए केंद्र सरकार की ओर से हर बच्चे को दी जाने वाली 50 लाख रुपये की राशि बढ़ाने की मांग की।

शून्यकाल में यह मुद्दा उठाते हुए बोंडे ने कहा कि 2021 से पहले दुर्लभ बीमारियों के बारे में कोई नीति नहीं थी। 2021 में दुर्लभ बीमारियों के लिए राष्ट्रीय नीति बनाई गई और देश भर में कुछ उत्कृष्टता केंद्र स्थापित किए गए।

बोंडे ने कहा कि इस नीति के तहत गौचर, पेम्पे और फैब्री, एम्पियस जैसी बीमारियां शामिल हैं, जिन्हें ‘लाइसोसोमल स्टोरेज डिसऑर्डर’ (एलएसडी) के रूप में वर्गीकृत किया गया है।

उन्होंने कहा कि ऐसी बीमारियों में प्रति बालक इलाज की राशि 50 लाख रुपये है जिसमें बच्चे की एंजाइम परिवर्तन थैरेपी (एंजाइम रिप्लेसमेंट थैरेपी) की जाती है। यह थैरेपी आजीवन होती है जिससे बच्चे की मानसिक निशक्तता रुकती है और विकास होता है।

बोंडे ने कहा कि वह इस नीति में सुधार की मांग करते हैं। उन्होंने कहा कि एलएसडी से पीड़ित बच्चे का केंद्र की ओर से मिलने वाली 50 लाख रुपये की राशि से इलाज होता है और यह सहायता उत्कृष्टता केंद्रों में इलाज कराने पर, राष्ट्रीय आरोग्य निधि के तहत मिलती है। ‘‘लेकिन इस राशि के खत्म होने के बाद अगर उसका इलाज रुकता है तो उसकी बीमारी फिर से उभर आती है और जान जाने का खतरा होता है।’’

उन्होंने कहा कि एंजाइम परिवर्तन थैरेपी के लिए 50 लाख रुपये की सीमा खत्म कर, इस राशि को बढ़ाना चाहिए ताकि ऐसे बच्चों का सतत इलाज हो सके। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार को दीर्घकालीन और निरंतर थैरेपी के लिए कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व (सीएसआर) फंडिंग और कोर फंडिंग के उपयोग की अनुमति भी देनी चाहिए।

भाषा मनीषा अविनाश

अविनाश