विकास और पर्यावरण संरक्षण, दोनों हमेशा साथ-साथ चल सकते हैं : उपराष्ट्रपति सी पी राधाकृष्णन

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विकास और पर्यावरण संरक्षण, दोनों हमेशा साथ-साथ चल सकते हैं : उपराष्ट्रपति सी पी राधाकृष्णन

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  • Publish Date - August 19, 2026 / 09:14 PM IST,
    Updated On - August 19, 2026 / 09:14 PM IST

देहरादून, 19 अगस्त (भाषा) उपराष्ट्रपति सी.पी.राधाकृष्णन ने बुधवार को कहा कि विकास और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, बल्कि दोनों सदैव साथ-साथ चल सकते हैं।

उपराष्ट्रपति ने यह बात यहां इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी (आईजीएनएफए) में भारतीय वन सेवा (आईएफएस) के 2025-27 बैच के प्रशिक्षु अधिकारियों तथा प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे रॉयल भूटान वन सेवा के अधिकारियों को संबोधित करते हुए कही ।

उन्होंने नए वन अधिकारियों से विकास और संरक्षण, पारिस्थितिकी सुरक्षा और आजीविका तथा वर्तमान जरूरतों और भावी पीढ़ियों के हितों के बीच बेहतर संतुलन स्थापित करने के लिए व्यावहारिक एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने की अपील की।

उन्होंने कहा कि आने वाले दशकों में इन अधिकारियों पर देश के वन, वन्यजीव, जैव विविधता और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण एवं प्रबंधन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होगी ।

राधाकृष्णन ने कहा कि भारत की पारिस्थितिकी सुरक्षा मजबूत करने और 2070 तक ‘नेट-जीरो’ उत्सर्जन के लक्ष्य को हासिल करने में भारतीय वन सेवा की भूमिका बेहद अहम है।

उन्होंने कहा कि आधुनिक वैज्ञानिक वानिकी और भारत की सभ्यतागत ज्ञान परंपरा को एक-दूसरे का पूरक बनाकर देश के टिकाऊ भविष्य का निर्माण किया जाना चाहिए।

उन्होंने वन क्षेत्रों में पीढ़ियों से रह रहे समुदायों के पारंपरिक ज्ञान और अनुभव का सम्मान करने की जरूरत पर भी जोर दिया।

वन प्रबंधन में तकनीक की बढ़ती भूमिका का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने अधिकारियों से सुदूर संवेदी, जीआईएस, ड्रोन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और डेटा आधारित प्रणालियों का प्रभावी उपयोग करने को कहा ।

उन्होंने कहा कि लेकिन तकनीक के साथ क्षेत्रीय अनुभव, विवेकपूर्ण निर्णय क्षमता और स्थानीय लोगों के प्रति संवेदनशीलता भी जरूरी है।

उपराष्ट्रपति ने व्यक्तिगत उपलब्धियों के बजाय सामूहिक प्रयास और टीम भावना को महत्व देने की बात कही। उन्होंने कहा कि निरंतर सामूहिक प्रयास ही मजबूत संस्थानों और राष्ट्र का निर्माण करते हैं।

उन्होंने वन सेवाओं में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी का भी उल्लेख किया ।

उन्होंने कहा कि वर्तमान बैच में 17 प्रतिशत प्रशिक्षु महिलाएं हैं, जो एक उत्साहजनक बदलाव और नारी शक्ति का प्रमाण है ।

राधाकृष्णन ने प्रशिक्षु अधिकारियों को अपने कैरियर का मूल्यांकन केवल हासिल किए जाने वाले पदों से नहीं करने की सलाह दी और कहा कि उनकी असली पहचान इस बात से बनेगी कि उन्होंने कितने जंगलों को पुनर्जीवित किया, कितने वन्यजीवों की रक्षा की, कितने समुदायों का विश्वास जीता और आने वाली पीढ़ियों के लिए कैसी विरासत छोड़ी ।

उन्होंने अधिकारियों से राष्ट्रहित को सर्वोच्च प्राथमिकता देने का आह्वान करते हुए कहा कि “राष्ट्र प्रथम” होना चाहिए ।

उपराष्ट्रपति ने लोक सेवा में सत्यनिष्ठा के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि सत्यनिष्ठा से कोई समझौता नहीं किया जा सकता और कठिन फैसलों में संविधान, कानून, विज्ञान और व्यापक जनहित ही अधिकारियों के मार्गदर्शक होने चाहिए ।

कार्यक्रम में उत्तराखंड के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (सेवानिवृत्त), मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, आईजीएनएफए के निदेशक डॉ. राजेंद्र प्रसाद सहित अनेक गणमान्य लोग मौजूद रहे ।

भाषा दीप्ति राजकुमार

राजकुमार