नयी दिल्ली, एक अप्रैल (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक विमान में महिला पत्रकार के साथ छेड़छाड़ की कथित घटना को लेकर सोशल मीडिया पर किए गए “मानहानिकारक” पोस्ट को हटाने का निर्देश दिया है।
अदालत ने कहा है कि किसी औपचारिक जांच से पहले सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर इन आरोपों का प्रसार करना और आरोपी की पहचान जाहिर करना गरिमापूर्ण जीवन और निष्पक्ष सुनवाई के उसके (आरोपी) मौलिक अधिकार का गंभीर उल्लंघन है।
न्यायमूर्ति विकास महाजन ने आरोपी की ओर से दायर याचिका पर पारित अंतरिम आदेश में महिला पत्रकार के साथ-साथ कुछ ऑनलाइन मंचों से कहा कि वे मई में होने वाली अगली सुनवाई तक याचिकाकर्ता (आरोपी) के खिलाफ “मानहानिकारक आरोप” पोस्ट न करें।
अदालत ने कहा कि मीडिया समूहों और डिजिटल मंचों ने न सिर्फ प्राथमिकी में लगाए गए आरोपों की रिपोर्टिंग की, बल्कि वादी को “दोषी” और “छेड़छाड़ करने वाला” बताकर जांच या सुनवाई पूरी होने से पहले ही फैसला सुना दिया। उसने कहा कि मामले में मीडिया समूहों और डिजिटल मंचों की ओर से गढ़ा गया विमर्श प्राथमिकी के दायरे का उल्लंघन है।
उच्च न्यायालय ने अभिनेत्री ऋचा चड्ढा की ओर से किए गए एक सोशल मीडिया पोस्ट पर भी चिंता जताई, जिसमें उन्होंने “बिना पुष्टि वाले आरोप” का समर्थन और प्रसार किया था।
अदालत ने कहा कि ऋचा के पोस्ट को सिर्फ अभिव्यक्ति की आजादी नहीं माना जा सकता, क्योंकि यह आरोपी को “सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा करने और डिजिटल मंच पर दोषी करार देने वाला कारक” साबित हुआ।
उच्च न्यायालय ने कहा कि एक सार्वजनिक हस्ती होने के नाते ऋचा की कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी है कि वह “गंभीर आरोपों को जोर-शोर से उठाने के लिए अपने मंच का इस्तेमाल करने” से पहले तथ्यों का सत्यापन करें।
अदालत ने ऋचा को निर्देश दिया कि वह भविष्य में इस मामले को और तूल देने वाले पोस्ट न करें। ऋचा की ओर से पेश वकील ने बताया कि अभिनेत्री ने अपना पोस्ट पहले ही हटा दिया है।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि उनके मुवक्किल बेहद प्रतिष्ठित कॉरपोरेट पेशेवर हैं, जिनका दो दशकों से अधिक का करियर बेदाग रहा है और जिन्हें ‘मीडिया ट्रायल’ का शिकार होना पड़ा है।
वकील ने कहा कि 11 मार्च को दिल्ली से मुंबई की यात्रा के दौरान इंडिगो की एक उड़ान में महिला पत्रकार ने उनके मुवक्किल को अचानक नींद से जगाया और उन पर आपत्तिजनक व्यवहार करने का झूठा आरोप लगाया।
वकील ने दावा किया कि विमान से उतरने के बाद महिला पत्रकार ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट के जरिये उनके मुवक्किल पर झूठे, दुर्भावनापूर्ण और मानहानिकारक आरोप लगाए; जिसे बाद में अन्य प्रतिवादियों ने बिना किसी सत्यापन के और अधिक प्रसारित किया तथा मामले को सनसनीखेज बना दिया गया।
वकील ने दलील दी कि ये आरोप सार्वजनिक परिवहन में उत्पीड़न पर महिला पत्रकार के डॉक्यूमेंट्री प्रोजेक्ट की कहानी से आश्चर्यजनक रूप से मिलते-जुलते हैं।
महिला पत्रकार की ओर से पेश वकील ने कहा कि मानहानि के मामलों में सच ही एकमात्र बचाव होता है। उन्होंने ‘गैग ऑर्डर’ (बोलने या जानकारी साझा करने पर रोक लगाने वाले आदेश) जारी किए जाने का विरोध किया।
उच्च न्यायालय ने कहा कि प्रतिवादी महिला पत्रकार की ओर से “सार्वजनिक मंच पर बेहद जल्दबाजी में जानकारी साझा करना” प्रथम दृष्टया संकेत देता है कि यह कानूनी तरीके से इंसाफ हासिल करने के बजाय इस मुद्दे को सनसनीखेज बनाने और वादी को लोगों की आजमाइश की कसौटी पर धकेलने का प्रयास था।
भाषा पारुल नरेश
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