नयी दिल्ली, 16 सितंबर (भाषा) भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) गुवाहाटी और बीएचयू के शोधकर्ताओं ने विषैले एजो रंग वाले कपड़ा अपशिष्ट जल के शोधन के लिए एक पर्यावरण अनुकूल जैविक तरीका विकसित किया है। अधिकारियों ने बुधवार को यह जानकारी दी।
शोध के निष्कर्ष ‘एनवायरनमेंटल जियोकेमिस्ट्री एंड हेल्थ’ नामक पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं। यह पत्रिका स्वास्थ्य और पर्यावरण के बीच संबंधों से जुड़े नवीन शोध प्रकाशित करती है।
बायोकेमिकल एंड एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग प्रयोगशाला के एसोसिएट प्रोफेसर सेल्वराजू नारायणसामी के अनुसार, यह शोध एजो रंगों वाले कपड़ा अपशिष्ट जल के लिए जैविक शोधन प्रणाली विकसित करने का वैज्ञानिक आधार उपलब्ध कराता है। यह तरीका पारंपरिक रासायनिक और भौतिक-रासायनिक शोधन विधियों के पर्यावरण अनुकूल विकल्प या पूरक के रूप में काम कर सकता है।
शोध में ‘ब्रेवुनडीमोनास एसपी. एजेजेड05’ नामक एक नये जीवाणु की क्षमता का प्रदर्शन किया गया है। यह जीवाणु व्यापक रूप से इस्तेमाल होने वाले सिंथेटिक रंग ‘डायरेक्ट ब्लू-6’ (डीबी-6) का 98.50 प्रतिशत तक अपघटन कर सकता है। जीवाणु उपचार के बाद बनने वाले अपघटन उत्पाद गैर-विषैले पाए गए।
नारायणसामी ने कहा, ‘कपड़ा उद्योग के अपशिष्ट जल में एजो रंग हो सकते हैं, जिन्हें हटाना मुश्किल होता है क्योंकि उनकी रासायनिक संरचना स्थिर होती है। इन रंगों में एजो बंध (–एन=एन–) होता है, जो उन्हें रंग और रासायनिक स्थिरता प्रदान करता है। यही कारण है कि ये पारंपरिक शोधन प्रक्रियाओं के प्रति प्रतिरोधी होते हैं। बिना शोधन के छोड़ा गया कपड़ा अपशिष्ट जल जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिए जोखिम पैदा कर सकता है और मानव स्वास्थ्य पर भी असर डाल सकता है।’
पारंपरिक रासायनिक और भौतिक-रासायनिक शोधन विधियां ऊर्जा की अधिक खपत वाली हो सकती हैं और इनसे द्वितीयक प्रदूषक भी पैदा हो सकते हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि अपशिष्ट जल से केवल दिखाई देने वाला रंग हटा देना जरूरी नहीं कि उसकी मूल विषाक्तता को भी समाप्त कर दे।
नारायणसामी ने बताया कि टीम अब प्रयोगशाला स्तर पर प्राप्त निष्कर्षों को व्यावहारिक और बड़े पैमाने पर इस्तेमाल की जा सकने वाली अपशिष्ट जल शोधन तकनीक में बदलने की दिशा में काम कर रही है।
उन्होंने कहा, ‘हम कपड़ा अपशिष्ट जल से एजो रंगों को हटाने के लिए एक सतत शोधन प्रणाली विकसित करने की योजना बना रहे हैं। दीर्घकालिक लक्ष्य इस सूक्ष्मजीवी मंच को औद्योगिक उपयोग की दिशा में आगे बढ़ाना है।’
भाषा अमित माधव
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