नयी दिल्ली, 16 सितंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को सवाल किया कि किसी राजनीतिक दल पर अधिकार तय करने के लिए क्या विधायी बहुमत को ‘‘सुरक्षित परीक्षण’’ माना जा सकता है, खासकर तब जब उस बहुमत का गठन करने वाले विधायकों के खिलाफ ही पद से अयोग्यता की कार्यवाही लंबित हो।
शीर्ष अदालत ने यह सवाल एकनाथ शिंदे नीत गुट से किया और उन विधायकों की संख्या के आधार पर फैसला करने की कानूनी जटिलताओं को रेखांकित किया, जिनकी सदस्यता की स्थिति ही जांच के दायरे में थी।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने एकनाथ शिंदे गुट की ओर से अंतिम दलीलें पेश कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल से पूछा, ‘‘हालांकि विधायी बहुमत एक प्रासंगिक परीक्षण है, लेकिन क्या इसे हमेशा निर्णायक या सुरक्षित परीक्षण माना जा सकता है, खासकर तब जब उन्हीं विधायकों से संबंधित अयोग्यता की कार्यवाही लंबित हो?’’
कौल ने राजनीतिक दल में बहुमत का पता लगाने के लिए शीर्ष अदालत द्वारा तय परीक्षण प्रक्रिया और निर्वाचन आयोग द्वारा अलग-अलग मामलों में इसे लागू किए जाने का उल्लेख किया।
उन्होंने कहा, ‘‘हर कोई कहता है कि वे (दल के) संविधान का पालन करते हैं। लेकिन जब हम संगठनात्मक ढांचे की जांच करते हैं तो हमें क्या मिलता है?’’
उन्होंने कहा, ‘‘यह दल निरंकुश तरीके से चलाया जाता है और इसके दो-तिहाई से अधिक सदस्यों की नियुक्ति पार्टी अध्यक्ष करते हैं।’’
उन्होंने सवाल किया कि क्या ऐसा संगठन जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं की इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है?
कौल ने कहा, ‘‘निर्वाचन आयोग ने अंततः इस मामले के विशेष तथ्यों को देखते हुए यह माना कि विधायी बहुमत ही एकमात्र व्यावहारिक परीक्षण था।’’
उन्होंने कहा कि उद्धव ठाकरे गुट का यह कहना भ्रामक है कि ‘सुभाष देसाई’ फैसले में विधायी बहुमत परीक्षण पर रोक लगाई गई है।
वरिष्ठ वकील ने कहा, ‘‘सुभाष देसाई फैसले में बार-बार यह माना गया है कि निर्वाचन आयोग अपनी व्यापक शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए किसी मामले के विशेष तथ्यों और परिस्थितियों के अनुरूप परीक्षण तय कर सकता है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘यदि सभी उपलब्ध परीक्षणों की जांच के बाद निर्वाचन आयोग यह निष्कर्ष निकालता है कि विशेष परिस्थितियों में कोई अन्य परीक्षण लागू नहीं किया जा सकता, तो वह व्यावहारिक परीक्षण अपना सकता है।’’
कौल ने कहा कि शिवसेना का संगठनात्मक ढांचा मुख्य रूप से मनोनीत सदस्यों से बना था और वह पार्टी या उसके कार्यकर्ताओं की आकांक्षाओं को प्रतिबिंबित नहीं करता था।
उन्होंने कहा, ‘‘कार्यकर्ताओं की संख्या इतनी अधिक थी कि आयोग के समक्ष प्रत्येक सदस्य को पेश नहीं किया जा सकता था। निर्वाचित प्रतिनिधि विभाजित थे और उनमें से कुछ के खिलाफ अयोग्यता की कार्यवाही लंबित थी, इसलिए तीनों परीक्षणों की अपनी सीमाएं थीं।’’
इस पर न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि अगर तीनों परीक्षणों की अपनी सीमाएं हैं तो एक और विकल्प उपलब्ध है।
उन्होंने कहा, ‘‘किसी भी गुट को आरक्षित चुनाव चिह्न का लाभ नहीं दिया जाना चाहिए था। दोनों गुटों को अलग-अलग चिह्न चुनने और अपनी ताकत के आधार पर चुनाव लड़ने का निर्देश दिया जा सकता था।’’
कौल ने जवाब दिया कि उपयुक्त मामलों में अदालत ने बार-बार विधायी बहुमत को वैध परीक्षण के रूप में मान्यता दी है, क्योंकि यह विशेष परिस्थितियों में लोकतांत्रिक इच्छा का प्रतिनिधित्व कर सकता है।
मामले में सुनवाई बृहस्पतिवार को भी जारी रहेगी।
यह मामला उद्धव ठाकरे नीत गुट की ओर से दायर उन याचिकाओं से जुड़ा है, जिनमें शिंदे गुट को असली शिवसेना के रूप में मान्यता देने के निर्वाचन आयोग के फैसले को चुनौती दी गई है।
इस विवाद में महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष के उस फैसले को दी गई चुनौती भी शामिल है, जिसमें उन्होंने शिंदे नीत खेमे के विधायकों को पद से अयोग्य ठहराने से इनकार कर दिया था।
ठाकरे गुट का कहना है कि शिंदे गुट द्वारा शिवसेना नाम और चुनाव चिह्न का इस्तेमाल अवैध है। ठाकरे गुट ने उच्चतम न्यायालय से चुनाव चिह्न बहाल करने या शिंदे गुट को इसके इस्तेमाल से रोकने का अनुरोध किया है।
भाषा शफीक नरेश
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