जयपुर, 11 अगस्त (भाषा) जयपुर के ऐतिहासिक आमेर किले की ऊंची-ऊंची दीवारों और इसके वैभव को निहारते हुए हाथी की पीठ पर सवार होकर किले तक पहुंचना कभी पर्यटकों के सबसे यादगार अनुभवों में से एक हुआ करता था लेकिन अब इस शाही सफर की रौनक धीरे-धीरे फीकी पड़ रही है। आंकड़े बताते हैं कि पिछले सात वर्षों में हाथी की सवारी करने वाले पर्यटकों की संख्या करीब 70 प्रतिशत घट गई है।
आमेर महल प्रशासन से उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2018-19 में जहां 1,64,608 पर्यटकों ने हाथी सफारी का आनंद लिया था वहीं 2025-26 में यह आंकड़ा घटकर 48,474 रह गया।
इसके अनुसार 2019-20 में 1,08,378 पर्यटकों ने हाथी सफारी की थी। कोरोना महामारी के दौरान 2020-21 में यह संख्या घटकर महज 2,922 रह गई। इसके बाद 2021-22 में 9,560, 2022-23 में 54,514, 2023-24 में 79,090, 2024-25 में 67,018 और 2025-26 में 48,474 पर्यटकों ने हाथी सफारी का आनंद लिया।
विश्व हाथी दिवस के मौके पर हाथियों के संरक्षण और कल्याण को लेकर जागरुकता बढ़ाए जाने के बीच आमेर के ये आंकड़े पर्यटन की बदलती पसंद की कहानी भी बयां करते हैं।
प्रशासन के अनुसार, कोरोना महामारी के बाद पर्यटन गतिविधियां भले ही सामान्य हो गई हों, लेकिन हाथी सफारी की लोकप्रियता पुराने स्तर पर नहीं लौट सकी। वर्ष 2018-19 के मुकाबले 2025-26 में हाथी की सवारी करने वाले पर्यटकों की संख्या में एक लाख से अधिक की कमी दर्ज की गई।
पर्यटन क्षेत्र से जुड़े लोगों का मानना है कि हाथी सफारी से पर्यटकों के दूर होने के पीछे विदेशी पर्यटकों की संख्या में कमी के साथ उनकी बदलती पसंद भी अहम कारण है। खासकर विदेशी पर्यटकों में पशु कल्याण को लेकर जागरुकता बढ़ी है। यही वजह है कि कई पर्यटक जानवरों के इस्तेमाल वाली गतिविधियों के बजाय जीप सफारी और प्रकृति आधारित पर्यटन को तरजीह दे रहे हैं।
पर्यटन विशेषज्ञ महेश शर्मा ने कहा कि दुनिया भर में पशु कल्याण को लेकर चलाए जा रहे अभियानों का असर हाथी सफारी पर भी पड़ा है।
उन्होंने कहा, ‘‘कई अंतरराष्ट्रीय टूर संचालकों और ट्रैवल कंपनियों ने अपनी पशु कल्याण नीतियों के तहत हाथी की सवारी को अपने टूर पैकेज से हटा दिया है। इसका खासा असर विदेशी पर्यटकों के बीच हाथी सफारी की मांग पर पड़ा है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘देश में राष्ट्रीय उद्यानों, अभयारण्यों और अन्य वन्यजीव पर्यटन स्थलों के बढ़ते विकल्पों ने भी पर्यटकों के सामने कई नयी गतिविधियों का आनंद लेने के रास्ते खोल दिए हैं।’’
पर्यटन विशेषज्ञ अशोक चौधरी ने कहा, ‘‘पशु कल्याण से जुड़े अंतरराष्ट्रीय अभियानों के कारण कई विदेशी पर्यटक हाथी की सवारी से परहेज कर रहे हैं। कई टूर संचालक भी अपने यात्रा पैकेज में इसे पहले जैसी प्राथमिकता नहीं दे रहे हैं।’’
उन्होंने कहा कि विदेशी पर्यटकों में जीप सफारी और अनुभव आधारित पर्यटन की मांग बढ़ रही है जबकि हाथी सफारी धीरे-धीरे वैकल्पिक गतिविधि बनती जा रही है।
चौधरी ने कहा, ‘‘यूरोपीय देशों की आर्थिक परिस्थितियों और पश्चिम एशिया में जारी तनाव का असर भी अंतरराष्ट्रीय पर्यटन पर पड़ा है। इजराइल और आसपास के क्षेत्रों से आने वाले पर्यटकों की संख्या में कमी का असर जयपुर के पर्यटन कारोबार पर भी पड़ा है।’’
आमेर में हाथी सफारी को लेकर पिछले कुछ वर्षों में पशु अधिकार संगठनों ने भी विरोध-प्रदर्शन किए हैं। इन संगठनों ने पर्यटन में हाथियों के इस्तेमाल के साथ उनके स्वास्थ्य और देखभाल से जुड़े मुद्दे उठाए हैं। इन विवादों ने भी हाथी सफारी को लेकर पर्यटकों के बीच बहस को तेज किया है।
पर्यटन विशेषज्ञ संजय कौशिक ने कहा कि आमेर महल राजस्थान का ऐसा प्रमुख ऐतिहासिक स्थल है जहां कई दशकों से हाथी की सवारी होती रही है। हालांकि, पिछले करीब पांच वर्षों में इसे लेकर पर्यटकों का रुझान लगातार कम हुआ है और इसके पीछे कई कारण हैं।
हाथी गांव विकास समिति के अध्यक्ष बल्लू खान ने कहा कि विदेशी पर्यटकों की संख्या में कमी के कारण आमेर महल में हाथियों के फेरे भी कम हो गए हैं। उन्होंने बताया कि एक हाथी के भोजन पर प्रतिदिन करीब 4,000 रुपये तक खर्च आता है।
विशेषज्ञों का कहना था कि बदलते पर्यटन रुझानों के बीच हाथियों के संरक्षण और पर्यटन के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। जयपुर की पहचान आमेर किले और उसकी ऐतिहासिक विरासत से गहराई से जुड़ी है, ऐसे में भविष्य में पर्यटन को अधिक जिम्मेदार, पशु-अनुकूल और पर्यावरण केंद्रित बनाने पर जोर देना होगा।
भाषा बाकोलिया धीरज खारी नरेश
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