मौखिक साक्ष्य के बिना विभागीय कार्यवाही में कर्मचारी को दंडित नहीं किया जा सकता : उच्च न्यायालय

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मौखिक साक्ष्य के बिना विभागीय कार्यवाही में कर्मचारी को दंडित नहीं किया जा सकता : उच्च न्यायालय

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  • Publish Date - July 8, 2026 / 01:04 AM IST,
    Updated On - July 8, 2026 / 01:04 AM IST

लखनऊ, सात जुलाई (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने कहा है कि किसी सरकारी कर्मचारी को विभागीय कार्यवाही में तब तक दंडित नहीं किया जा सकता, जब तक आरोप मौखिक साक्ष्य के जरिए सिद्ध न कर दिए जाएं।

उच्च न्यायालय ने सोमवार को कहा कि केवल दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर, गवाहों की जांच किए बिना और नियमित मौखिक सुनवाई किए बिना दंड देना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों तथा ‘उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियमावली, 1999’ का उल्लंघन है।

न्यायमूर्ति करुणेश सिंह पवार ने मोहनलालगंज के तत्कालीन उपजिलाधिकारी (एसडीएम) संतोष कुमार सिंह की याचिका स्वीकार करते हुए यह आदेश पारित किया।

यह मामला वर्ष 2019 में भसंडा गांव में आवासीय पट्टों के आवंटन में कथित अनियमितताओं से संबंधित है।

विभागीय जांच के बाद राज्य सरकार ने सितंबर 2025 में संतोष कुमार सिंह की एक वार्षिक वेतनवृद्धि स्थायी रूप से रोक दी थी और उनके सेवा अभिलेख में निंदा प्रविष्टि दर्ज की थी। उनके द्वारा दंड के खिलाफ दी गई अभ्यावेदन को दिसंबर 2025 में खारिज कर दिया गया था।

याचिकाकर्ता ने दलील दी कि जांच अधिकारी ने न तो मौखिक सुनवाई की और न ही किसी गवाह का परीक्षण किया, जिससे उन्हें गवाहों से जिरह करने का अवसर नहीं मिल सका।

उन्होंने राजस्व परिषद की उस राय का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि उन्होंने पूरी सावधानी बरती थी, अनियमितताओं का पता चलने के बाद सुधारात्मक कदम उठाए थे और उनके खिलाफ किसी दुर्भावना का कोई प्रमाण नहीं है।

याचिका स्वीकार करते हुए उच्च न्यायालय ने कहा कि विभाग आरोप सिद्ध करने के लिए मौखिक साक्ष्य प्रस्तुत करने में विफल रहा। अदालत ने यह भी कहा कि अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने याचिकाकर्ता के बचाव और राजस्व परिषद की राय की अनदेखी करते हुए यांत्रिक ढंग से दंडादेश पारित कर दिया।

अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि विभागीय जांच पूरी करने में लगभग चार वर्ष का विलंब हुआ, जिसका कोई संतोषजनक कारण नहीं बताया गया।

भाषा

सं, जफर रवि कांत