पैलेट गन के इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए पूर्व आईपीएस अधिकारी, दो घायल न्यायालय पहुंचे

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पैलेट गन के इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए पूर्व आईपीएस अधिकारी, दो घायल न्यायालय पहुंचे

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  • Publish Date - July 28, 2026 / 12:07 PM IST,
    Updated On - July 28, 2026 / 12:07 PM IST

नयी दिल्ली, 28 जुलाई (भाषा) भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के एक पूर्व अधिकारी और दो घायलों ने उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर कर नागरिक प्रदर्शनों को नियंत्रित करने के लिए सुरक्षा बलों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली पैलेट गन (छर्रे वाली बंदूक) पर रोक लगाने या उसे निष्क्रिय करने की मांग की है।

यह याचिका पूर्व आईपीएस अधिकारी यशोवर्धन आजाद, प्रशांत कुमार और शेख इरशाद मंसूरी ने सोमवार को अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर के माध्यम से दायर की है। इसमें केंद्र और संबंधित अधिकारियों को निर्देश देने की मांग की गई है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाली एजेंसियों द्वारा नागरिक सभाओं को तितर-बितर करने के लिए ‘पंप एक्शन राइफल’ या ‘प्रोजेक्टाइल एक्शन गन’ से धातु के छर्रे या इसी तरह के प्रक्षेप्य हथियारों के इस्तेमाल को बंद किया जाए।

प्रशांत कुमार (25) ने याचिका में कहा है कि वह नीट पेपर लीक के विरोध में

20 जुलाई को आयोजित ‘संसद चलो’ मार्च में शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी के रूप में शामिल हुए थे। उनका दावा है कि रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) के जवानों की गोलीबारी में उन्हें पैलेट के छर्रे लगे जबकि उनकी ओर से न कोई उकसावे वाली और न ही कोई आक्रामक गतिविधि हुई।

शेख इरशाद मंसूरी (26) ने कहा कि वह पासपोर्ट और वीजा से जुड़े काम के बाद दिल्ली के कनॉट प्लेस में मौजूद थे और आरएएफ की कार्रवाई में उन्हें भी पैलेट गन के छर्रे लगे, जबकि उनकी ओर से कोई उकसावा या हिंसक गतिविधि नहीं की गई थी।

याचिका में कहा गया है कि 20 जुलाई 2026 को उच्च शिक्षा की विश्वसनीयता को प्रभावित कर रहे पेपर लीक की घटनाओं के विरोध में कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) की ओर से आयोजित ‘संसद चलो’ मार्च के दौरान दिल्ली पुलिस ने भीड़ नियंत्रण के लिए केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) की रैपिड एक्शन फोर्स की मदद ली थी।

याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि शाम करीब चार से साढ़े चार बजे के बीच पुलिस और आरएएफ कर्मियों ने लगातार आंसू गैस के गोले छोड़े, लाठीचार्ज किया और प्रदर्शनकारियों को कनॉट प्लेस के इनर सर्कल की ओर धकेल दिया। याचिका में कहा गया कि इस दौरान पानी की बौछार का इस्तेमाल नहीं किया गया और बल प्रयोग से पहले कोई चेतावनी भी नहीं दी गई।

याचिका के अनुसार, जब प्रदर्शनकारी पीछे हट रहे थे और कई लोग हाथ उठाकर आत्मसमर्पण जैसी स्थिति में थे, तब भी आरएएफ कर्मियों ने अचानक ‘पंप एक्शन गन’ चलानी शुरू कर दी, जिससे निकले छर्रे प्रशांत कुमार और मंसूरी के शरीर में घुस गए और उन्हें तुरंत दर्द तथा रक्तस्राव हुआ।

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि शांतिपूर्ण सभा करने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत मौलिक अधिकार है और इस अधिकार पर केवल उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी प्रतिबंध को आवश्यकता और समानुपातिकता के सिद्धांतों की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए, जैसा कि उच्चतम न्यायालय ने कई फैसलों में स्पष्ट किया है।

याचिका में कहा गया कि ‘प्रोजेक्टाइल एक्शन गन’ शांतिपूर्ण नागरिक सभाओं को नियंत्रित करने के लिए उपयुक्त नहीं हैं और सुरक्षा बलों की तैनाती होने की स्थिति में इनके इस्तेमाल पर रोक लगाई जानी चाहिए।

याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि पैलेट गन से छोड़े गए छर्रों की दिशा अनिश्चित होती है, जिससे यह हथियार मनमाना, खतरनाक और नागरिक भीड़ को नियंत्रित करने के लिए अनुपयुक्त बन जाता है। उन्होंने कहा कि इस तरह के हथियारों का इस्तेमाल किसी भी स्थिति में ‘‘जरूरी न्यूनतम बल’’ के सिद्धांत के अनुरूप नहीं माना जा सकता।

याचिका में 20 जुलाई को नयी दिल्ली में पुलिस की कार्रवाई के दौरान पैलेट गन से घायल हुए सभी लोगों को उचित मुआवजा देने, उनका पूरा इलाज कराने और पुनर्वास की व्यवस्था सुनिश्चित करने की भी मांग की गई है।

भाषा मनीषा रंजन

रंजन