कर्मचारियों को सांता क्लॉज की लाल टोपी पहनने के लिए मजबूर करना उचित नहीं : उच्च न्यायालय

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कर्मचारियों को सांता क्लॉज की लाल टोपी पहनने के लिए मजबूर करना उचित नहीं : उच्च न्यायालय

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  • Publish Date - September 23, 2026 / 12:03 AM IST,
    Updated On - September 23, 2026 / 12:03 AM IST

प्रयागराज, 22 सितंबर (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कार्यस्थल पर कर्मचारियों को सांता क्लॉज की लाल टोपी पहनने के लिए मजबूर करने के खिलाफ चेतावनी देते हुए कहा है कि ऐसी बाध्यता विभिन्न धर्मों और आस्थाओं वाले लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचा सकती है।

न्यायालय ने कहा कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में इस तरह की कार्रवाई की अनुमति नहीं है, जहां प्रत्येक नागरिक को अपनी आस्था और विश्वास का पालन करने की स्वतंत्रता है।

न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव ने यह टिप्पणी आरोपी विक्रम सिंह उर्फ विश्व विक्रम सिंह की ओर से दायर याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए की। याचिका में आरोपपत्र, संज्ञान लेने/समन जारी करने के आदेश और आपराधिक कार्यवाही को चुनौती दी गई थी।

याचिकाकर्ता के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 298 (किसी व्यक्ति की धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर ठेस पहुंचाने के इरादे से शब्दों का उच्चारण आदि) और धारा 504 (शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर अपमान करना) के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी।

आरोपों के अनुसार, आगरा स्थित वी-बाजार में काम करने वाले याचिकाकर्ता ने अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को सांता क्लॉज की लाल टोपी पहनने के लिए मजबूर किया था।

याचिकाकर्ता ने आरोपपत्र, समन आदेश और पूरी आपराधिक कार्यवाही को चुनौती देते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय का रुख किया था।

याचिका के साथ दाखिल दस्तावेजों की जांच करते हुए उच्च न्यायालय ने कहा कि यह स्पष्ट है कि वी-बाजार के वरिष्ठ अधिकारियों ने कर्मचारियों पर ऐसी बाध्यता बनाई थी।

उच्च न्यायालय ने कहा कि सांता क्लॉज की लाल टोपी पहनने के लिए मजबूर करना विभिन्न धर्मों और आस्थाओं की भावनाओं को किसी न किसी रूप में आहत कर सकता है।

अदालत ने कहा कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसी कार्रवाई की अनुमति नहीं है, जहां प्रत्येक व्यक्ति को अपनी आस्था और विश्वास का पालन करने की स्वतंत्रता है।

न्यायालय ने याचिकाकर्ता और उसके वरिष्ठ अधिकारियों को भविष्य में इस तरह के निर्देश दोहराने से बचने की चेतावनी दी। अदालत ने कहा कि ऐसे निर्देश कर्मचारियों के बीच कार्यस्थल के शांतिपूर्ण और सौहार्दपूर्ण माहौल को प्रभावित कर सकते हैं।

आपराधिक कार्यवाही को चुनौती दिए जाने के संबंध में याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने दलील दी कि आईपीसी की धाराएं 298 और 504 गैर-संज्ञेय अपराध हैं।

दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 2(डी) के स्पष्टीकरण (मजिस्ट्रेट को मौखिक या लिखित रूप से किए गए किसी आरोप) का उल्लेख करते हुए न्यायालय ने कहा कि इस मामले में जांच अधिकारी द्वारा आईपीसी की धाराओं 298 और 504 के तहत दाखिल आरोपपत्र को शिकायत के रूप में माना जाएगा और उसी के अनुसार इसका निस्तारण किया जाएगा।

उच्च न्यायालय ने कहा कि मजिस्ट्रेट ने मामले में राज्य मुकदमे के रूप में संज्ञान लेकर कानूनी त्रुटि की है।

इसके बाद उच्च न्यायालय ने आगरा के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) द्वारा दिसंबर 2023 में जारी समन आदेश को याचिकाकर्ता के संबंध में रद्द कर दिया और याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया।

भाषा

सं, राजेंद्र रवि कांत