नयी दिल्ली, नौ सितंबर (भाषा) भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश बी.आर. गवई ने बुधवार को कहा कि संसद में व्यवधान के कारण गंवाया गया हर घंटा ‘समीक्षा और बहस का एक घंटा खोना’ है। उन्होंने जोर दिया कि यह मुद्दा अंततः संवैधानिक जिम्मेदारी से जुड़ा है।
यहां आयोजित 16वें संसद रत्न पुरस्कार कार्यक्रम को संबोधित करते हुए न्यायमूर्ति गवई ने कहा कि असहमति लोकतंत्र का आवश्यक हिस्सा है, लेकिन इसे संविधान द्वारा लोकतांत्रिक विचार-विमर्श के लिए स्थापित संस्थानों के माध्यम से ही व्यक्त किया जाना चाहिए।
न्यायमूर्ति गवई ने कहा, “व्यवधान के कारण खोया गया हर घंटा समीक्षा और बहस के खोए हुए एक घंटे के समान है। यह मुद्दा केवल संसद की उत्पादकता का नहीं है, बल्कि अंततः संवैधानिक जिम्मेदारी का है।’’
उन्होंने कहा कि सांसदों की जिम्मेदारी है कि वे सुनिश्चित करें कि कानूनों की सावधानीपूर्वक समीक्षा हो, अलग-अलग विचारों को सुना जाए और जिन लोगों का वे प्रतिनिधित्व करते हैं, उनके हितों पर वास्तविक रूप से विचार किया जाए।
न्यायमूर्ति गवई ने कहा, ‘‘लोकतंत्र में असहमति होना स्वाभाविक है। ऐसे मौके आएंगे जब सदस्य सरकार के फैसलों का पुरजोर विरोध करेंगे। ऐसी असहमति न केवल जायज है, बल्कि लोकतंत्र के सुचारु संचालन के लिए जरूरी भी है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘लेकिन असहमति को संविधान द्वारा लोकतांत्रिक विचार-विमर्श के लिए स्थापित संस्थानों के माध्यम से ही व्यक्त किया जाना चाहिए।’’
न्यायमूर्ति गवई ने कहा कि सांसदों को ऐसे कानून बनाते समय तत्कालिक और राजनीतिक हितों से आगे बढ़कर सोचना चाहिए, जिनका प्रभाव आने वाली पीढ़ियों पर पड़ सकता है।
भाषा संतोष प्रशांत
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