नयी दिल्ली, 23 अगस्त (भाषा) विधि मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी की कॉफी-टेबल पुस्तक का शनिवार को कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने विमोचन किया।
‘सैक्रर्ड टाइगर टेल्स — फ्रॉम वैदिक हाइम्स टू ट्रिस्ट विद स्ट्राइप्स’ शीर्षक वाली 248 पृष्ठों की इस पुस्तक को मनोज कुमार ने लिखा और इसके लिए तस्वीरें भी खींची हैं। वह विधि एवं न्याय मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव हैं तथा राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) के सदस्य भी हैं।
पुस्तक का विमोचन शनिवार को नयी दिल्ली स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल, भारत के अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी और अन्य गणमान्य व्यक्तियों की मौजूदगी में हुआ।
वैदिक ऋचाओं और महाकाव्यों से लेकर मुगल दरबार, औपनिवेशिक दौर और आधुनिक बाघ अभयारण्यों तक, एक नयी पुस्तक भारत की सभ्यता में बाघ के स्थान की 5,000 से अधिक वर्षों की यात्रा को रेखांकित करती है।
इस पुस्तक में 82 कहानियों, ऐतिहासिक विवरणों और वन्यजीव तस्वीरों के माध्यम से देश के राष्ट्रीय पशु के स्थायी सांस्कृतिक एवं संरक्षण महत्व को सामने लाने का प्रयास किया गया है।
पुस्तक के नौ अध्यायों में वैदिक एवं महाकाव्य काल, बौद्ध और जातक परंपराओं, शास्त्रीय एवं भक्ति साहित्य, मुगल काल, औपनिवेशिक भारत, स्वतंत्रता संग्राम और गणराज्य के संरक्षण आंदोलन के दौरान बाघ की स्थिति का वर्णन किया गया है।
प्रकाशक की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, ओकब्रिज पब्लिशिंग द्वारा प्रकाशित 248 पृष्ठों की इस कॉफी-टेबल पुस्तक का समापन कुमार के शब्दों में बाघ के “नौवें जीवन” से होता है। इससे आशय मौजूदा दौर में विकास तथा वन्यजीव एवं प्राकृतिक आवासों के संरक्षण के बीच संतुलन कायम रखने की लगातार बनी चुनौती से है।
पुस्तक में 82 में से प्रत्येक कथा धर्मग्रंथों, इतिहास-वृत्तांतों, लोककथाओं और सांस्कृतिक स्मृतियों सहित किसी पहचाने जा सकने वाले स्रोत पर आधारित है। इन कथाओं को मनोज कुमार द्वारा 2014 से 2026 के बीच भारत के विभिन्न बाघ अभयारण्यों और राष्ट्रीय उद्यानों में खींची गई तस्वीरों के साथ पुनः प्रस्तुत किया गया है।
पुस्तक का मूल विचार केवल वन्यजीव फोटोग्राफी या ऐतिहासिक कथाओं तक सीमित नहीं है। इसमें कहा गया है कि बाघों की संख्या और उनके पर्यावासों की रक्षा के लिए आवश्यक जिम्मेदारी व्यापक रूप से संतुलन, संयम और सह-अस्तित्व के सिद्धांतों से जुड़ी है।
कुमार ने लिखा है कि “कानून, अपने सर्वोत्तम रूप में, केवल अधिकार की अभिव्यक्ति नहीं है। यह संतुलन, जिम्मेदारी और सह-अस्तित्व का माध्यम भी है।”
लेखक के अनुसार, बाघ इसलिए केवल संरक्षण किए जाने वाली एक प्रजाति नहीं, बल्कि इस बात का प्रतीक भी है कि भारत अपनी प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत में से क्या संरक्षित रखना चाहता है।
पुस्तक में इतिहास, आध्यात्मिकता, लोककथा, कानून, फोटोग्राफी और संरक्षण को एक साथ प्रस्तुत किया गया है। लेखक और प्रकाशक के अनुसार, यह एक ही कृति में बाघ की पूरी सभ्यतागत और संरक्षण यात्रा को प्रस्तुत करने का अपनी तरह का पहला प्रयास है।
पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने पुस्तक के लिए अपने संदेश में इसे इस शानदार प्रजाति को “भावपूर्ण सम्मान” बताया। उन्होंने कहा कि इतिहास, संस्कृति, आध्यात्मिकता और संरक्षण को एक साथ पिरोकर यह पुस्तक याद दिलाती है कि बाघ की रक्षा करना अंततः जीवन के सामंजस्य को संरक्षित करने के बारे में है।
पुस्तक में यादव, भारत के अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया महासचिव एवं सीईओ रवि सिंह तथा वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन सोसाइटी ऑफ इंडिया के संस्थापक एवं कार्यकारी निदेशक बेलिंडा राइट की प्रस्तावनाएं भी शामिल हैं। इनमें सरकार, कानून, संरक्षण और कॉरपोरेट जगत के दृष्टिकोण सामने आते हैं।
भाषा अमित वैभव
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