नयी दिल्ली, 14 अप्रैल (भाषा) सामाजिक कार्यकर्ताओं के एक समूह ने मंगलवार को सवाल उठाया कि विधायी निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण लागू करने के लिए परिसीमन की आवश्यकता क्यों है।
समूह ने मांग की कि महिला आरक्षण को लोकसभा और विधानसभाओं की वर्तमान संख्या के आधार पर ही लागू किया जाना चाहिए।
सामाजिक कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज, नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन वूमेन (एनएफआईडब्ल्यू) की एनी राजा, अधिवक्ता प्रशांत भूषण, अर्थशास्त्री संतोष मेहरोत्रा, सामाजिक कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी और योजना आयोग की पूर्व सदस्य सैयदा हमीद ने यहां प्रेसवार्ता में सरकार से महिला आरक्षण एवं परिसीमन को लेकर प्रस्तावित कानूनों पर व्यापक परामर्श करने का आह्वान किया, जिसमें महिला आंदोलनों की राय लेना भी शामिल है।
भारद्वाज ने सांसदों के साथ कानूनों के मसौदों को साझा करने में हो रही देरी पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि ये (मसौदे) अभी तक लोगों के सामने नहीं आये हैं।
लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण को ‘अमलीजामा पहनाने’ के लिए संसद के निचले सदन की संख्या को वर्तमान 543 से बढ़ाकर 850 तक करने वाला एक विधेयक बृहस्पतिवार को संसद में पेश किया जाएगा।
भारद्वाज ने कहा, “ये कानून भारत के चुनावी लोकतंत्र को मौलिक रूप से बदल देंगे और देश के हर मतदाता को प्रभावित करेंगे। प्रस्तावित कानूनों के बारे में जानकारी लोगों तक केवल सूत्रों पर आधारित खबरों के माध्यम से ही पहुंच रही है। यह सूचना के मौलिक अधिकार और पूर्व-विधायी परामर्श नीति में निर्धारित सिद्धांतों का घोर उल्लंघन है।”
उन्होंने कहा कि 2023 के महिला आरक्षण अधिनियम – नारी शक्ति वंदन अधिनियम – में एक संशोधन की आवश्यकता है, ताकि इसे जनगणना और परिसीमन से अलग किया जा सके तथा इसे विधानमंडलों की वर्तमान संख्या के आधार पर तत्काल प्रभाव से लागू किया जा सके।
राजा ने कहा कि महिला आंदोलन दशकों से महिलाओं के लिए आरक्षण की मांग कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि 2010 में राज्यसभा में एक विधेयक पारित हुआ था, लेकिन उसे लोकसभा में पेश नहीं किया गया।
उन्होंने कहा, ‘‘सभी को यह समझना चाहिए कि यह विधेयक इसलिए नहीं लाया गया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अचानक महिलाओं की मांगों के प्रति संवेदनशील हो गए, बल्कि इसलिए लाया गया क्योंकि उच्चतम न्यायालय ने महिला आरक्षण लागू करने की मांग को लेकर एनएफआईडब्ल्यू द्वारा दायर मामले में कड़ी टिप्पणियां की थीं। एनएफआईडब्ल्यू ने 2023 के महिला आरक्षण अधिनियम को चुनौती दी थी, क्योंकि इसमें आरक्षण के मुद्दे को जनगणना और परिसीमन से जोड़ा गया था।”
राजा ने कहा, “हम भारत में चुनावी लोकतंत्र को राजनीतिक रूप से प्रेरित परिसीमन के माध्यम से कमजोर करने का पुरजोर विरोध करते हैं, जिसे महिला आरक्षण की आड़ में लाया जा रहा है।”
भूषण ने केंद्र की सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर संसद के कामकाज को लगातार बाधित करने का आरोप लगाया और संसदीय समितियों को विधेयक न भेजने के लिए उसकी कड़ी आलोचना की।
भूषण ने कहा कि विधानसभा चुनावों के बीच, जब राजनीतिक दल चुनाव प्रचार में व्यस्त हैं, तो 16 से 18 अप्रैल तक संसद का विस्तारित सत्र जल्दबाजी में बुलाना लोकतंत्र का पूर्णतः मजाक है।
हमीद ने महिलाओं के लिए आरक्षण के दशकों लंबे संघर्ष का वर्णन करते हुए कहा कि महिला संगठनों और नेताओं ने अखिल भारतीय रेल यात्रा की एवं एक कपड़े पर लाखों हस्ताक्षर एकत्र किए।
उन्होंने कहा, “जिस तरह से दो दिन बाद संसद उन विधेयकों पर चर्चा शुरू करेगी, जिसे देश ने नहीं देखा है और न ही उसपर गौर किया है, तो ऐसे में वह एक ढोंग है। महिलाओं को सशक्त बनाने का यह तरीका नहीं है।”
मेहरोत्रा ने कहा कि अगर चार विपक्षी दल – कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी (एसपी) और द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) – एक साथ आ जाएं तो लोकसभा में विधेयक गिराये जा सकते हैं।
भाषा राजकुमार सुरेश
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