नयी दिल्ली, 19 जून (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने 21 जून को दोबारा आयोजित की जा रही राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा-स्नातक (नीट-यूजी) से पहले सोशल मीडिया मंच ‘टेलीग्राम’ तक पहुंच को अस्थायी रूप से प्रतिबंधित करने के केंद्र सरकार के फैसले को शुक्रवार को बरकरार रखा।
अदालत ने कहा कि यह कदम अनुचित नहीं है, क्योंकि ‘टेलीग्राम’ बड़ी मात्रा में कंटेंट के “ऑटोमेटेड डिसेमिनेशन” में मदद कर सकता है।
“ऑटोमेटेड डिसेमिनेशन” एक सॉफ्टवेयर आधारित प्रक्रिया है, जिसके तहत कोई जानकारी, रिपोर्ट या अलर्ट बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के विशिष्ट उपयोगकर्ताओं तक पहुंचाए जाते हैं।
उच्च न्यायालय ने 39 पन्नों के अपने आदेश में 21 जून को राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा-स्नातक (नीट-यूजी) का निष्पक्ष एवं सुचारु आयोजन सुनिश्चित करने के लिए केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की ओर से सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) अधिनियम की धारा-69ए के तहत लिए गए फैसले को कायम रखा।
यह धारा केंद्र सरकार को राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था और संप्रभुता की रक्षा के लिए किसी भी ऑनलाइन जानकारी, वेबसाइट या एप्लीकेशन तक सार्वजनिक पहुंच को अवरुद्ध करने का अधिकार देती है।
राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) ने मेडिकल कॉलेज में दाखिले के लिए तीन मई को आयोजित नीट-यूजी को प्रश्नपत्र लीक के आरोपों के मद्देनजर 12 मई को रद्द कर दिया था।
न्यायमूर्ति तेजस करिया की अवकाशकालीन पीठ ने दो सवालों पर विचार किया। पहला, क्या विवादित आदेश ठीक से सोच-समझे बिना जारी किया गया था। दूसरा, क्या ‘टेलीग्राम’ तक पहुंच को अस्थायी रूप से अवरुद्ध करना ‘आनुपातिकता’ के सिद्धांत के अनुरूप था।
पीठ ने दोनों सवालों का जवाब देते हुए कहा, “प्रतिवादी संख्या-1 (केंद्र सरकार) की ओर से आदेशों के तहत अपनाए गए उपाय संबंधित उद्देश्य को हासिल करने के लिए लागू सबसे कम प्रतिबंधात्मक उपाय हैं।”
उसने संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) स्थित मैसेजिंग ऐप की याचिका खारिज करते हुए कहा, “इसलिए ‘टेलीग्राम’ तक लोगों की पहुंच अस्थायी रूप से बाधित करने के प्रतिवादी नंबर-1 के कदम को अनुचित नहीं माना जा सकता।”
पीठ ने आईटी अधिनियम की धारा-69ए का जिक्र करते हुए कहा कि सरकार के पास किसी भी ऑनलाइन जानकारी तक लोगों की पहुंच को अवरुद्ध करने का अधिकार है।
उसने कहा, “आईटी अधिनियम की धारा-69ए केंद्र सरकार या इस काम के लिए उसकी तरफ से विशेष रूप से अधिकृत किसी अधिकारी को इस बात का यकीन होने की सूरत में किसी भी कंप्यूटर रिसोर्स में बनाई गई, भेजी गई, प्राप्त की गई या सहेजी गई सामग्री तक जनता की पहुंच अवरुद्ध करने के निर्देश जारी करने का अधिकार देती है कि भारत की संप्रभुता एवं अखंडता, रक्षा एवं सुरक्षा, दूसरे देशों के साथ दोस्ताना संबंध या सार्वजनिक व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने वाले किसी भी संज्ञेय अपराध को रोकने के लिए ऐसी कार्रवाई जरूरी या उचित है।”
पीठ ने मामले की आपातकालीन प्रकृति और केंद्र सरकार की ओर से कार्रवाई के समर्थन में गिनाए गए कारणों पर गौर करते हुए कहा कि ये आधार “पर्याप्त” थे और कानून में निर्धारित प्रक्रिया का उचित पालन किया गया था।
फैसले में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दलीलों का संज्ञान लेते हुए कहा गया कि ‘टेलीग्राम’ पर परीक्षा से जुड़ी गलत जानकारी और कथित प्रश्नपत्र के प्रसार से सार्वजनिक व्यवस्था पर गंभीर असर पड़ सकता था और संज्ञेय अपराध हो सकते थे। इसमें कहा गया है कि ऐप तक पहुंच अस्थायी रूप से बाधित करने का फैसला इन्हीं स्थितियों से निपटने के लिए लिया गया था।
पीठ ने कहा, “इस अदालत का मानना है कि आदेश की आपातकालीन प्रकृति को देखते हुए संबंधित फैसला लेने के लिए दिए गए कारण पर्याप्त थे।”
उसने कहा, “आदेश पर गौर करने से पता चलता है कि केंद्र सरकार अपने सामने रखी गई जानकारी पर विचार करने के बाद इस बात से संतुष्ट थी कि परीक्षा से जुड़ी गलत जानकारी और कथित प्रश्नपत्र के प्रसार तथा अन्य गैर-कानूनी गतिविधियों के लिए ‘टेलीग्राम’ का दुरुपयोग किया जा रहा था, जिससे देश में कानून-व्यवस्था पर गंभीर असर पड़ने की आशंका थी।”
पीठ ने कहा कि केंद्र सरकार ने ‘टेलीग्राम’ तक लोगों की पहुंच 22 जून तक अवरुद्ध करने और इसके ‘मैसेज-एडिटिंग’ फीचर को 30 जून तक निष्क्रिय रखने का निर्देश दिया है।
उसने कहा, “इसमें कोई शक नहीं कि किसी कानूनी या प्रशासनिक संस्था के हर फैसले के पीछे ठोस कारण होने चाहिए, क्योंकि ये कारण प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का एक जरूरी हिस्सा हैं। कारण यह बताते हैं कि संस्था के सामने रखी गई जानकारी और उसकी तरफ से निकाले गए नतीजों के बीच क्या संबंध है। साथ ही, इससे यह भी पता चलता है कि संस्था ने संबंधित तथ्यों और परिस्थितियों पर ठीक से विचार किया है।”
पीठ ने कहा कि ‘टेलीग्राम’ चैनल और ग्रुप में बड़ी संख्या में उपयोगकर्ताओं को जोड़ने की सुविधा देता है।
उसने कहा, “यह ऐप बड़े पैमाने पर सामग्री के प्रसार में मददगार है, जिससे जानकारी बहुत कम समय में बड़ी संख्या में उपयोगकर्ताओं तक पहुंच सकती है। नतीजतन, अगर ‘टेलीग्राम’ पर किसी अवैध सामग्री को साझा किया जाता है, तो उसका तेजी से प्रचार हो सकता है और इससे कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा होने की आशंका रहती है।”
पीठ ने कहा कि अन्य पारंपरिक मंचों के विपरीत ‘टेलीग्राम’ पूरी तरह से क्लाउड आधारित है, जिससे बड़ी मात्रा में सामग्री को सहेजा और पुन: हासिल किया जा सकता है।
उसने कहा, “टेलीग्राम पर बड़े पैमाने पर ‘बॉट’ भी मौजूद हैं, जो बिना इंसानी दखल के किसी सामग्री का ऑटोमैटिक तरीके से प्रसार करने और अन्य गतिविधियों को अंजाम देने में सक्षम हैं। इसके अलावा, फोन नंबर की जगह ‘यूजरनेम’ का इस्तेमाल उपयोगकर्ताओं को अपनी पहचान छिपाने में सक्षम बनाता है और अवैध सामग्री सहित अन्य कंटेंट के प्रसार को आसान बनाता है।”
‘टेलीग्राम’ ने सोशल मीडिया ऐप के बीच खुद को अलग-थलग किए जाने के कारण भेदभावपूर्ण व्यवहार और अनुच्छेद-14 के उल्लंघन का हवाला देते हुए अदालत का रुख किया था।
‘टेलीग्राम’ ने दावा किया था कि उसने नीट की अवैध सामग्री से जुड़े 900 से अधिक लिंक हटा दिए हैं और उल्लंघनों की पहचान करने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), मशीन लर्निंग टूल और ‘मैनुअल मॉडरेशन’ का इस्तेमाल किया है।
भाषा पारुल संतोष
संतोष