उच्चतम न्यायालय ने महिला वकीलों के लिए अदालत परिसर में अनुकूल वातावरण बनाने पर जोर दिया

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उच्चतम न्यायालय ने महिला वकीलों के लिए अदालत परिसर में अनुकूल वातावरण बनाने पर जोर दिया

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  • Publish Date - June 19, 2026 / 06:49 PM IST,
    Updated On - June 19, 2026 / 06:49 PM IST

नयी दिल्ली, 19 जून (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को ऐसा वातावरण बनाने की जरूरत पर जोर दिया, जिनमें महिला वकील अपनी पेशेवर जिम्मेदारियों को प्रभावी ढंग से, सुरक्षित रूप से और बराबरी के आधार पर निभा सकें।

देश भर की ज्यादातर अदालतों, अधिकरणों और आयोगों में महिलाओं के लिए विभिन्न सुविधाओं वाले बार कक्ष और दूसरी आवश्यक सुविधाओं की कमी की ओर इशारा करने वाली एक याचिका में उठाए गए मुद्दों पर गौर करते हुए, न्यायालय ने कहा कि इन चिंताओं को सिर्फ सुविधा-असुविधा का मामला मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कहा कि पिछले कुछ दशकों में वकालत के पेशे में महिलाओं की भागीदारी में लगातार और उत्साहजनक बढ़ोतरी हुई है।

पीठ ने कहा कि हालांकि, अवसर मिलना ही जश्न मनाने का पर्याप्त कारण नहीं हो सकता।

पीठ ने कहा कि उनकी भागीदारी को सार्थक बनाने के लिए ऐसा वातावरण बनाना होगा जिसमें महिला वकील अपनी पेशेवर जिम्मेदारियां प्रभावी ढंग से, सुरक्षित रूप से और बराबरी के आधार पर निभा सकें।

न्यायालय ने कहा कि अदालत परिसर में महिला पेशेवरों के लिए जरूरी सुविधाओं वाली जगह का होना अनिवार्य शर्त है।

पीठ ने केंद्र सरकार, सभी राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर इस याचिका पर उनका जवाब मांगा।

शीर्ष अदालत ने कहा कि अदालत परिसर भले ही सिर्फ एक ऐसी जगह लगती हो जहां कानूनी कार्यवाही होती है, लेकिन जो लोग कानून के पेशे में अपना जीवन बिताते हैं, वे जानते हैं कि यह उससे कहीं ज्यादा है।

पीठ ने कहा, ‘‘यह एक ऐसी जगह है जहां वकील अपने पेशेवर जीवन का एक बड़ा हिस्सा बिताते हैं और अक्सर यह उनके लिए दूसरे घर जैसा बन जाता है।’’ न्यायालय ने इस बात पर भी जोर दिया कि अधिकतर वकील इस परिसर में लंबा समय बिताते हैं।

न्यायालय ने कहा कि ऐसी जगह न होने से महिला वकीलों पर बहुत बुरा असर पड़ता है और कुछ मामलों में वे अपना काम जारी रखने से हतोत्साहित भी हो सकती हैं।

पीठ ने कहा, ‘‘ऐसी आवश्यक सुविधाओं की व्यवस्था, प्रथम दृष्टया, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और सम्मान की मौलिक गारंटी से सीधे तौर पर जुड़ी है।’’

मामले की सुनवाई 17 जुलाई के लिए तय करते हुए, पीठ ने अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि, सभी राज्यों के महाधिवक्ताओं और केंद्र शासित प्रदेशों के सरकारी वकीलों से अनुरोध किया कि वे उस दिन मौजूद रहें और इस मामले में सहायता दें।

भाषा सुभाष अविनाश

अविनाश