नयी दिल्ली, 18 अगस्त (भाषा) दिल्ली की एक अदालत ने गुजरात पुलिस के उन चार अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाई है, जिन पर एक आरोपी की तलाश के दौरान उसके नाबालिग बेटे को अहमदाबाद ले जाने का आरोप है।
अदालत ने कहा है कि आरोपी पुलिसकर्मियों ने “औपनिवेशिक शासकों” की तरह व्यवहार किया और पिता को आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर करने के वास्ते उसके बच्चे का “कमजोर नब्ज के तौर पर इस्तेमाल किया।”
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश परवीन सिंह ने आरोपी अधिकारियों की ओर से दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने अपहरण के अपराध का संज्ञान लेते हुए उनके खिलाफ आरोप तय करने के निचली अदालत के आदेश को चुनौती दी थी।
न्यायमूर्ति सिंह ने 12 अगस्त को सुनाए गए फैसले में कहा कि अधिकारियों का काम नाबालिग के, एक मामले में वांछित पिता की तलाश करना था, न कि बच्चे को हिरासत में लेकर दिल्ली से गुजरात ले जाना।
उन्होंने कहा, “अधिकारियों का काम नाबालिग के पिता को खोजना था, जो एक मामले में आरोपी है, न कि नाबालिग को हिरासत में लेना और पुराने जमाने के औपनिवेशिक शासकों की तरह बर्ताव करते हुए पिता को आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर करने के वास्ते बच्चे को कमजोर नब्ज की तरह इस्तेमाल करना।”
बच्चे की मां ने पुलिस में दर्ज शिकायत में आरोप लगाया कि 25 मई 2008 को सादे कपड़ों में गुजरात पुलिस के पांच-छह अधिकारी उसके पति को ढूंढते हुए दिल्ली स्थित उसकी कबाड़ की दुकान पर आए, जो एक मामले में आरोपी है।
शिकायतकर्ता के मुताबिक, पुलिसकर्मी उसके नाबालिग बेटे को उसकी वैध अभिरक्षा से जबरन अपने साथ गुजरात ले गए। उसने आरोप लगाया कि बच्चे को दिल्ली से गुजरात जाते समय उसके साथ बदसलूकी की गई और उसे पीटा गया।
पुलिसकर्मियों ने दलील दी कि वे फरार आरोपी की तलाश के दौरान अपने आधिकारिक कर्तव्यों का पालन कर रहे थे, इसलिए उनके खिलाफ मुकदमा चलाने से पहले सरकार की पूर्व अनुमति लेना जरूरी था।
अदालत ने आरोपी पुलिसकर्मियों की दलील खारिज करते हुए कहा कि सरकारी कर्मचारियों को उनके आधिकारिक कर्तव्यों से जुड़े कार्यों के लिए मिलने वाली कानूनी सुरक्षा ऐसे किसी कृत्य पर लागू नहीं हो सकती, जिसका उस कर्तव्य से कोई तार्किक संबंध न हो।
अदालत ने कहा कि बच्चे के पिता का पता लगाने के लिए उसे उसकी मां की अभिरक्षा से लेकर अहमदाबाद ले जाना “किसी भी तरह से” पुलिसकर्मियों के आधिकारिक कर्तव्य का हिस्सा नहीं माना जा सकता।
अदालत ने कहा कि पुनरीक्षण याचिका “पूरी तरह से गलत तथ्यों” पर आधारित है।
उसने कहा कि याचिका में दावा किया गया है कि मामले का संज्ञान 2026 में लिया गया, जबकि रिकॉर्ड से पता चलता है कि इसका संज्ञान वास्तव में 2010 में ही ले लिया गया था।
अदालत ने आरोपी पुलिसकर्मियों की याचिका खारिज करते हुए उनके खिलाफ अपहरण से जुड़ी कानूनी धाराओं के तहत मामले का संज्ञान लेने और आरोप तय करने के निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा।
भाषा पारुल मनीषा
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