जोधपुर, 20 अप्रैल (भाषा) राजस्थान उच्च न्यायालय ने एक नाबालिग के यौन उत्पीड़न के मामले में प्रवचनकर्ता आसाराम की दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा के खिलाफ दायर अपील पर सोमवार को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।
जोधपुर की एक अदालत ने अप्रैल 2018 के इस मामले में आसाराम (85) को उसके प्राकृतिक जीवनकाल के शेष समय के लिए कारावास की सजा सुनाई थी।
न्यायमूर्ति अरुण मोंगा और न्यायमूर्ति योगेंद्र कुमार पुरोहित की पीठ ने लंबी चली सुनवाई दोनों पक्षों की अंतिम दलीलें सुनने के बाद पूरी कर ली। दिसंबर 2025 में उच्चतम न्यायालय ने लंबित अपीलों का तीन महीने के भीतर निपटारा करने का निर्देश दिया था, जिसके बाद कार्यवाही समयबद्ध तरीके से संचालित की गई।
बचाव पक्ष की दलीलें इस महीने की शुरुआत में संपन्न हुई थीं, जबकि पीड़िता के वकील पी सी सोलंकी ने सोमवार को पीठ द्वारा मामले को सुरक्षित रखे जाने से पहले अपनी दलीलें पूरी कर लीं।
उच्चतम न्यायालय के निर्देशों पर अमल करते हुए, उच्च न्यायालय ने 16 फरवरी से प्रतिदिन सुनवाई निर्धारित की थी।
आसाराम को 2013 में जोधपुर के पास मनई गांव स्थित अपने आश्रम में एक नाबालिग के साथ यौन उत्पीड़न के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। बाद में, न्यायाधीश मधुसूदन शर्मा की अध्यक्षता वाली एक विशेष पॉक्सो अदालत ने उसे दोषी करार दिया था।
मामले में सह-आरोपी शिवा और शिल्पी को 20 साल की जेल की सजा सुनाई गई, जबकि शरद और प्रकाश को बरी कर दिया गया।
कुछ सह-आरोपियों की सजा निलंबित कर दी गई और वे फिलहाल जमानत पर हैं। आसाराम खुद 29 अक्टूबर 2025 से चिकित्सा कारणों से अस्थायी जमानत पर है।
आसाराम ने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए अपनी अंतरिम जमानत की अवधि बढ़ाने का अनुरोध किया है और मौजूदा राहत की अवधि समाप्त होने के मद्देनजर इस पर 15 अप्रैल को तत्काल विचार करने का अनुरोध किया है।
हालांकि, उच्च न्यायालय ने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि जमानत याचिका पर रजिस्ट्री द्वारा निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार सुनवाई की जाएगी।
भाषा सुभाष दिलीप
दिलीप