नयी दिल्ली, 15 जनवरी (भाषा) केंद्रीय गृह मंत्रालय ने बृहस्पतिवार को उच्चतम न्यायालय को अवगत कराया कि उसने ‘डिजिटल अरेस्ट’ मामलों से जुड़े मुद्दों की जांच के लिए एक उच्चस्तरीय समिति गठित की है।
‘डिजिटल अरेस्ट’ एक तरह का साइबर अपराध है, जिसमें ठगी करने वाले लोग कानून प्रवर्तन अधिकारियों, अदालती अधिकारियों या सरकारी एजेंसियों के कर्मचारियों के रूप में खुद को पेश करते हैं तथा ऑडियो और वीडियो कॉल के माध्यम से पीड़ितों को डराते-धमकाते हैं। वे पीड़ितों को बंधक बना लेते हैं और उनपर पैसे देने का दबाव डालते हैं।
पिछले साल दिसंबर में, न्यायालय ने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को ‘डिजिटल अरेस्ट’ के मामलों की देशव्यापी एकीकृत जांच करने का निर्देश दिया था।
यह निर्देश हरियाणा के एक बुजुर्ग दंपति की शिकायत पर स्वतः संज्ञान लेते हुए दायर एक मामले में दिया गया था।
न्यायालय ने साइबर अपराध के मामलों से निपटने के तरीकों पर गृह मंत्रालय सहित विभिन्न केंद्रीय मंत्रालयों से भी राय मांगी थी।
गृह मंत्रालय ने न्यायालय को बताया कि ‘डिजिटल अरेस्ट’ के मामलों की व्यापक जांच के लिए विशेष सचिव (आंतरिक सुरक्षा) की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय अंतर-विभागीय समिति का गठन किया गया है।
इसने कहा कि समिति को सौंपे गए कार्यों में प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा सामना किए जाने वाले ‘रियल टाइम’ मुद्दों की जांच करना, न्याय मित्र की सिफारिशों और अदालत के निर्देशों पर विचार करना, संबद्ध कानूनों, नियमों, परिपत्रों और कार्यान्वयन की कमियों की पहचान करना, सुधारात्मक उपायों का सुझाव देना शामिल था।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, समिति के सदस्यों में इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, विदेश मंत्रालय, वित्तीय सेवा विभाग, विधि एवं न्याय मंत्रालय, उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय, भारतीय रिजर्व बैंक, सीबीआई, राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए), दिल्ली पुलिस और भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (आई4सी) के अधिकारी शामिल हैं।
गृह मंत्रालय ने कहा कि आई4सी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) समिति के सदस्य-सचिव होंगे। इसमें यह भी कहा गया कि समिति की बैठक हर दो सप्ताह में होगी।
मंत्रालय ने बताया कि समिति की पहली बैठक 29 दिसंबर को हुई थी, जब सीबीआई ने मामलों के लिए एक मौद्रिक सीमा निर्धारित करने का सुझाव दिया था।
गृह मंत्रालय ने बताया कि आई4सी ने सूचित किया है कि रकम की निकासी को तत्काल रोकने एवं उसे वापस हासिल करने के लिए मानक संचालन प्रक्रियाओं (एसओपी) पर अंतिम रूप से विचार किया जा रहा है। इसके अलावा, राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (एनसीआरपी) और 1930 हेल्पलाइन के पुनर्गठन पर भी सक्रिय रूप से विचार किया जा रहा है।
इसने कहा कि समिति ने पीड़ित को मुआवजे के लिए न्याय मित्र के सुझाव पर भी विचार किया और इस बात पर सहमति जताई कि ऐसी राहत उस स्थिति में प्रदान की जा सकती है जब नुकसान लापरवाही के कारण हुआ हो या बैंकों या दूरसंचार सेवा प्रदाताओं की ओर से सेवा में चूक या धोखाधड़ी हुई हो।
गृह मंत्रालय ने कहा कि समिति ने पाया कि व्यवस्थागत विफलताओं या नियमों के अनुपालन में कमी के कारण पीड़ितों को नुकसान नहीं उठाना चाहिए।
समिति ने आगे विचार-विमर्श और सुझावों के लिए न्यायालय से एक महीने का समय मांगा, जिसके बाद मामले की आगे की कार्यवाही 20 जनवरी के लिए तय की गई।
भाषा सुभाष सुरेश
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