नयी दिल्ली, तीन अगस्त (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि मानवीय गरिमा जीवन का एक अहम हिस्सा है और वाहन मोटर दुर्घटना मुआवज़े से जुड़े कानूनों के तहत, ऐसे मामले जिनमें बच्चे स्थायी या लगभग पूरी तरह से दिव्यांग हो जाते हैं, वे एक अलग और खास श्रेणी में आते हैं।
न्यायालय ने कहा कि ऐसे मामलों में मुआवज़ा तय करते समय अदालतों को यह ध्यान रखना चाहिए कि बच्चे की न केवल शारीरिक क्षमता छिन गई है, बल्कि उसका पूरा भविष्य प्रभावित हुआ है।
ये टिप्पणियां न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने की। पीठ ने एक बच्चे को मिलने वाले मुआवजे को 45.40 लाख रुपये से बढ़ाकर 83.38 लाख रुपये कर दिया। इस बच्चे को सड़क दुर्घटना में रीढ़ की हड्डी और तंत्रिका तंत्र (न्यूरोलॉजिकल) में गंभीर चोटें आई थीं।
पीठ ने गौर किया कि जून 2015 में जब दुर्घटना हुई थी, तब बच्चा सिर्फ छह महीने का था और उसकी दिव्यांगता स्थायी और कभी ठीक नहीं होने वाली है।
उसने कहा, ‘‘मानवीय गरिमा जीवन का एक अहम हिस्सा है। जब कोई गंभीर चोट किसी बच्चे से सामान्य काम करने की क्षमता छीन लेती है, तो इससे होने वाला नुकसान सिर्फ शारीरिक दिव्यांगता तक सीमित नहीं रहता, बल्कि गरिमा से लगातार वंचित रखता है।’’
पीठ ने कहा कि चोट न केवल शरीर को प्रभावित करती है, बल्कि जीवन को महसूस करने के तरीके को भी बदल देती है।
न्यायालय ने बच्चे की मां की अपील पर यह फैसला सुनाया। मां ने ओडिशा उच्च न्यायालय के जनवरी 2023 के फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील की थी। उच्च न्यायालय ने कटक में मोटर दुर्घटना दावा प्राधिकरण द्वारा अप्रैल 2022 में दिए गए 30.12 लाख रुपये के मुआवज़े को बढ़ाकर 45.40 लाख रुपये कर दिया था।
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि यह मामला एक ऐसे बच्चे का है जो कम उम्र में ही स्थायी रूप से दिव्यांग हो गया और दुर्घटना में लगी चोटों के कारण उसका पूरा भविष्य बदल गया है।
उसने कहा, “ऐसी स्थिति में, अदालत को ऐसा नजरिया अपनाना चाहिए जो व्यावहारिक और मानवीय हो और मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के तहत मुआवजा देने के तय सिद्धांतों के अनुरूप हो।”
भाषा अविनाश प्रशांत
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