आईआईटी मद्रास ने पॉलिमर तकनीक का कराया पेटेंट, बिना रसायन के जीवाणु को करेगी नष्ट

आईआईटी मद्रास ने पॉलिमर तकनीक का कराया पेटेंट, बिना रसायन के जीवाणु को करेगी नष्ट

आईआईटी मद्रास ने पॉलिमर तकनीक का कराया पेटेंट, बिना रसायन के जीवाणु को करेगी नष्ट
Modified Date: September 6, 2026 / 07:45 pm IST
Published Date: September 6, 2026 7:45 pm IST

(गुंजन शर्मा)

नयी दिल्ली, छह सितंबर (भाषा) भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मद्रास ने एक ऐसी रसायन-मुक्त जीवाणुरोधी सतह का पेटेंट कराया है, जो एंटीबायोटिक, कीटाणुनाशक, विकिरण या किसी अन्य रोगाणुरोधी रसायन के इस्तेमाल के बिना हानिकारक जीवाणु को खत्म कर सकती है। अधिकारियों ने यह जानकारी दी।

इस नवाचार का उद्देश्य दुनियाभर में उभर रही एक गंभीर समस्या यानी रोगाणुरोधी प्रतिरोध (एएमआर) से निपटना है। एएमआर वह स्थिति है, जिसमें बीमारी फैलाने वाले जीवाणु ‘‘सुपरबग’’ में बदल जाते हैं और पारंपरिक उपचारों के प्रति प्रतिरोधी हो जाते हैं।

धातुकर्म एवं सामग्री अभियांत्रिकी विभाग के प्रोफ़ेसर परशुरामन स्वामीनाथन के अनुसार, विकसित की गई यह प्रौद्योगिकी किसी रासायनिक प्रक्रिया पर आधारित नहीं है, बल्कि इसमें विशेष रूप से तैयार की गई नैनो संरचनाओं का इस्तेमाल किया गया है। ये नैनो संरचनाएं जीवाणु के संपर्क में आने पर उनकी कोशिका दीवार को तोड़कर उन्हें नष्ट कर देती हैं।

उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘ये सतह मानव कोशिकाओं के जुड़ने और बढ़ने के लिए सुरक्षित हैं, लेकिन जीवाणु पर ये गंभीर यांत्रिक दबाव डालती हैं, जिससे उनकी कोशिका दीवार टूट जाती है और वे नष्ट हो जाते हैं। नयी प्रतिरोपण-उपयुक्त पॉलिमर प्रौद्योगिकी जीवाणु की कोशिकाओं को भौतिक रूप से नष्ट करके एएमआर से लड़ती है और मानव कोशिकाओं के लिए सुरक्षित है।’’

इसके नतीजे शोध पत्रिका ‘एसीएस एप्लाइड बायोमटेरियल्स’ में प्रकाशित हुए हैं। विशेषज्ञों की समीक्षा के बाद इसमें अनुसंधान को शामिल किया जाता है।

उन्होंने कहा, ‘‘एएमआर दुनियाभर में स्वास्थ्य क्षेत्र की सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक है। हमारा काम जीवाणु के संक्रमण से निपटने के लिए एक बिल्कुल अलग रणनीति को दर्शाता है। रसायनों या दवाओं के इस्तेमाल के बजाय हमने सतह को ही इस तरह तैयार किया है कि वह जीवाणु को भौतिक रूप से नष्ट कर सके।’’

स्वामीनाथन ने कहा, ‘‘यह तरीका जीवाणु में दवाओं के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित होने के खतरे को काफी कम करता है। साथ ही, यह चिकित्सा और जनस्वास्थ्य के क्षेत्र में लंबे समय तक प्रभावी और पर्यावरण के अनुकूल समाधान उपलब्ध करा सकता है।’’

अध्ययन में सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्षों में से एक यह सामने आया कि प्लाज्मा प्रक्रिया से सिलिकॉन की सतह पर एक खास तरह की कठोर परत बनती है। यह परत मिश्रित ऑक्सीफ्लोरीनेटेड यौगिकों से बनी होती है।

उन्होंने कहा, ‘‘यह परत जीवाणु की कोशिकाओं तक यांत्रिक दबाव को प्रभावी ढंग से पहुंचाने में मदद करती है, जिससे नैनो संरचनाओं की जीवाणु को नष्ट करने की क्षमता बढ़ जाती है। शोधकर्ताओं के अनुसार, प्रतिरोपण में इस्तेमाल होने वाली सिलिकॉन सतहों पर इस तरह का प्रभाव पहले कभी नहीं देखा गया।’’

अनुसंधानकर्ताओं की टीम ने तीन अलग-अलग प्रकार के जीवाणुओं पर इस सतह का परीक्षण किया, जिसमें ‘ग्राम-पॉजिटिव’ और ‘ग्राम-नेगेटिव’ दोनों तरह के जीवाणु शामिल थे। परीक्षण में पाया गया कि नैनोग्रास संरचनाओं ने जीवाणु कोशिका दीवार को तोड़कर उन्हें नष्ट करने की मजबूत क्षमता दिखाई। साथ ही, इन संरचनाओं ने जीवाणु की परत बनने की प्रक्रिया को रोकने में भी प्रभावी भूमिका निभाई और परीक्षण किए गए सभी जीवाणु में 68 प्रतिशत से अधिक परत बनने को रोकने में सफलता हासिल की।

भाषा आशीष नेत्रपाल

नेत्रपाल


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