अवैध रेत खनन: न्यायालय ने कहा, पर्यावरण संबंधी कदमों को केवल जवाबी कार्रवाई तक सीमित न किया जाए

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अवैध रेत खनन: न्यायालय ने कहा, पर्यावरण संबंधी कदमों को केवल जवाबी कार्रवाई तक सीमित न किया जाए

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  • Publish Date - May 26, 2026 / 09:04 PM IST,
    Updated On - May 26, 2026 / 09:04 PM IST

नयी दिल्ली, 26 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि पर्यावरणीय संबंधी कदमों को केवल बार-बार न्यायिक हस्तक्षेप होने के बाद या संवैधानिक अदालतों के समक्ष व्यक्तिगत जवाबदेही के खतरे के डर से की जाने वाली “जवाबी कार्रवाई” तक सीमित नहीं किया जा सकता।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य के भीतर और आसपास के क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर अवैध रेत खनन से प्रभावित इलाकों में पर्यावरणीय और वैधानिक सुरक्षा उपायों के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए कई निर्देश दिए।

शीर्ष अदालत ने कहा कि संवैधानिक दायित्वों के तहत राज्य और उसके प्रतिष्ठानों का यह कर्तव्य है कि वे पर्यावरणीय नुकसान का पूर्वानुमान लगाएं, पारिस्थितिक गिरावट को रोकें और प्रभावी शासन एवं प्रवर्तन के माध्यम से नाजुक पारिस्थितिकी प्रणालियों का संरक्षण सुनिश्चित करें।

राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य को राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल वन्यजीव अभयारण्य भी कहा जाता है। यह 5,400 वर्ग किलोमीटर में तीन राज्यों में फैला संरक्षित क्षेत्र है। दुर्लभ घड़ियाल (लंबी थूथन वाले मगरमच्छ) के अलावा, यह अभयारण्य लाल मुकुट छतरी कछुओं और लुप्तप्राय ‘गंगा नदी डॉल्फिन’ का भी निवास स्थान है।

राजस्थान, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे इलाके में चंबल नदी पर स्थित इस अभयारण्य को सबसे पहले 1978 में मध्यप्रदेश में एक संरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया था। अब यह तीनों राज्यों द्वारा संयुक्त रूप से प्रबंधित एक लंबा एवं संकरा पारिस्थितिक संरक्षित क्षेत्र है।

शीर्ष अदालत ने 61 पन्नों के आदेश में राजस्थान, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश तथा भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) द्वारा दाखिल अनुपालन हलफनामों का उल्लेख किया।

पीठ ने कहा कि अब दाखिल किए गए हलफनामों से प्रशासनिक सक्रियता और संस्थागत समन्वय का वह स्तर दिखाई देता है, जो इस मामले पर पिछली सुनवाई के दौरान स्पष्ट रूप से नदारद था।

न्यायालय ने कहा, ‘‘राज्य के कई विभागों द्वारा विशिष्ट प्रस्तावों, प्रवर्तन उपायों, बजटीय आवंटन और परिचालन योजनाओं के साथ आगे आने से यह स्पष्ट होता है कि स्थिति की गंभीरता को कम से कम अब उचित प्रशासनिक स्तरों पर स्वीकार कर लिया गया है।’’

पीठ ने कहा कि वह इस ‘‘चिंताजनक तथ्य’’ को नजरअंदाज नहीं कर सकती कि उसके समक्ष उल्लेख कदमों को तभी उठाया गया प्रतीत होता है, जब अदालत ने कड़े निर्देश जारी किए और राजस्थान सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों की व्यक्तिगत उपस्थिति अनिवार्य की गई।

पीठ ने कहा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट होता है कि घटनाओं का क्रम प्रथम दृष्टया यह दर्शाता है कि निगरानी व्यवस्था, प्रवर्तन तंत्र, संचालन समन्वय, जब्ती की प्रक्रिया और अंतर-विभागीय कार्य योजनाओं से जुड़े कई अहम फैसले केवल तभी किए गए, जब न्यायिक हस्तक्षेप ने ‘‘अधिक सख्त और निगरानीपूर्ण’’ रूप ले लिया।

पीठ ने कहा कि इस मामले में उठे मुद्दे केवल नियमों के उल्लंघन की अलग-अलग घटनाएं नहीं हैं, बल्कि ये लगातार हो रहे पर्यावरणीय विनाश, संरक्षित वन्यजीव क्षेत्रों के क्षरण, संगठित अवैध खनन, सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के नुकसान से जुड़े हैं।

न्यायालय ने कहा कि पर्यावरण संबंधी कदमों को केवल जवाबी कार्रवाई तक सीमित नहीं किया जा सकता, जिसे बार-बार न्यायिक हस्तक्षेप के बाद या संवैधानिक अदालतों के समक्ष व्यक्तिगत जवाबदेही के खतरे के चलते ही अपनाया जाए।

संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए पीठ ने इन तीनों राज्यों को अपने-अपने वन विभागों में क्षेत्रीय स्तर के प्रवर्तन अधिकारियों की संख्या बढ़ाने के लिए तत्काल और प्रभावी कदम उठाने, वन रक्षकों के खाली पदों और अन्य कर्मियों की भर्ती करने का निर्देश दिया।

न्यायालय ने कहा कि ऐसे पदों के लिए भर्ती प्रक्रिया में तेजी लाई जानी चाहिए और ये राज्य यह सुनिश्चित करेंगे कि रिक्त पदों को भरने की प्रक्रिया तत्काल शुरू की जाए तथा एक वर्ष के भीतर पूरी हो जाए।

पीठ ने कहा, ‘‘राज्यों को प्रभावित क्षेत्रों में सीसीटीवी, एकीकृत निगरानी तंत्र, नियंत्रण केंद्र और संबद्ध तकनीकी ढांचा की स्थापना, संचालन के लिए तत्काल और प्रभावी कदम उठाने होंगे।’’

पीठ ने निर्देश दिया कि अवैध खनन और परिवहन गतिविधियों में शामिल वाहनों के चालकों के खिलाफ ही नहीं, बल्कि वाहन मालिकों, वित्तपोषकों, संचालकों, ठेकेदारों और उन सभी व्यक्तियों के खिलाफ भी उचित आपराधिक मुकदमा शुरू किया जाए, जो प्रभावित क्षेत्रों में सक्रिय संगठित अवैध खनन नेटवर्क का हिस्सा हैं, उसे बढ़ावा देते हैं या किसी भी तरह से उससे जुड़े हुए हैं।

निर्देशों के साथ पीठ ने कहा कि एनएचएआई, केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति से परामर्श करके, मध्यप्रदेश और राजस्थान को मुरैना-धौलपुर सीमा के पास जोड़ने वाले पुल पर उच्च-रिज़ॉल्यूशन सीसीटीवी निगरानी कैमरे लगाएगा।

भाषा आशीष सुरेश

सुरेश