नयी दिल्ली, एक अप्रैल (भाषा) राज्यसभा में बुधवार को विपक्ष ने दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) में बार-बार संशोधन करने, बड़े कॉरपोरेट चूककर्ताओं को कथित तौर पर राहत देने और राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण में बुनियादी ढांचे की समस्याओं के साथ-साथ लंबित मामलों की बढ़ती संख्या को लेकर सरकार की तीखी आलोचना की।
वहीं, सत्ता पक्ष ने कानून का बचाव करते हुए कहा कि इससे देश की बैंकिंग प्रणाली में काफी सुधार हुआ तथा वाणिज्यिक बैंकों की गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) की वसूली में भी मदद मिली।
उच्च सदन में ‘दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) विधेयक, 2025’ पर चर्चा में भाग लेते हुए कांग्रेस के राजीव शुक्ला ने कहा कि यह कानून 2016 में लाया गया था और इसका मकसद बंद या बीमार कंपनियों को पुनर्जीवित करना और नौकरियां बचाना था। लेकिन अब यह ढांचा कमजोर पड़ गया है।
उन्होंने कहा कि कानून के शुरुआती परिणाम बहुत अच्छे रहे लेकिन धीरे-धीरे इसमें पारदर्शिता का अभाव हो गया और यह घोटाले में तब्दील हो गया। उन्होंने आरोप लगाया कि इस कानून के जरिए कोई भी किसी की कंपनी हड़प सकता है और कौड़ियों के दाम में कंपनियां बिक जाती हैं।
भाजपा के राधा मोहन दास अग्रवाल ने कहा कि विपक्ष का आरोप है कि इस कानून के कारण बैंकों की स्थिति खराब होती जा रही है जबकि 2016 में इस कानून के लागू होने के बाद बैंकों के एनपीए में काफी कमी आई और बैंकों की ऋण वसूली भी बढ़ी है।
तृणमूल कांग्रेस के सुखेन्दु शेखर राय ने कहा कि यह कानून जल्दबाजी में लागू किया क्योंकि पिछले नौ साल में इसमें छह संशोधन किए गए हैं।
उन्होंने कहा कि ऋणदाताओं को अपने स्वीकृत दावों पर औसतन 67 से 70 प्रतिशत का नुकसान उठाना पड़ा है। इसका मतलब है कि बैंकों सहित अन्य ऋणदाता अपने बकाया ऋण का केवल 30 से 33 प्रतिशत ही वसूल कर पाते हैं।
राय ने कहा कि एक अनुमान है कि आईबीसी की शुरुआत से लेकर अब तक राष्ट्रीयकृत बैंकों को लगभग 8 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है।
आम आदमी पार्टी के संजय सिंह ने कहा कि आईबीसी के जरिए सरकार बड़े कर्ज़दारों को संरक्षण दे रही है, जिन पर भारी कर्ज़ है। इन कर्जदारों ने बैंकों में जमा आम लोगों के पैसे के साथ धोखाधड़ी की।
सिंह ने कहा कि सरकार गरीबों को पैसा नहीं देती, न ही एमएसएमई क्षेत्र को देती है लेकिन वह ‘‘कुछ अमीर दोस्तों’’ को देती है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार उनसे चंदा लेती है और उन्हें ‘धंधा’ देती है। उन्होंने आरोप लगाया कि उन बड़े चूककर्ताओं को बचाने के लिए यह विधेयक लाया गया है।
उन्होंने कहा कि कुल मिलाकर यह विधेयक बैंक डकैतियों को वैध बनाने जैसा है।
वाईएसआरसीपी के अयोध्या रामा रेड्डी ने आईबीसी के ज़रिए सरकार द्वारा किए गए काम की सराहना की और कहा कि उसने समय से सराहनीय कदम उठाए हैं।
उन्होंने कहा, “हमें संकटग्रस्त कंपनियों को अस्थायी वित्तीय सहायता प्रदान करने और समाधान प्रक्रिया के दौरान नौकरियों और मूल्य की रक्षा करने के लिए दिवालिया निधि के उपयोग में तेजी लाने की भी आवश्यकता है।”
बीजद के निरंजन बिशी ने कहा कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी समुदायों के लोगों को ऋण मुश्किल से मिल पाता है और उसकी वसूली भी कड़ाई से होती है।
उन्होंने कहा कि दिवाला का मतलब सजा नहीं बल्कि सम्मानपूर्वक समाधान होना चाहिए।
चर्चा में बीजद के मुजीबुल्ला खान, राजद के संजय यादव, नेशनल कॉन्फ्रेंस के चौधरी मोहम्मद रमजान, चर्चा में शिवसेना (उबाठा) की प्रियंका चतुर्वेदी, भाजपा के महेश भट्ट मदन राठौर और सुरेन्द्र सिंह नागर ने भी हिस्सा लिया।
भाषा
अविनाश मनीषा अविनाश सुभाष
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