World Tiger Day 2026: भारत विश्व के 70% जंगली बाघों का घर.. वन्यजीव संरक्षण की सफलता बनी दुनिया भर के लिए प्रेरणा.. पेश किया आदर्श मॉडल
अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस के अवसर पर भारत ने बाघ संरक्षण में अपनी वैश्विक नेतृत्वकारी भूमिका को रेखांकित किया है। विज्ञान आधारित नीतियों, तकनीकी निगरानी और सामुदायिक भागीदारी के बल पर देश अब दुनिया के लगभग 70% जंगली बाघों का घर बन चुका है और संरक्षण के क्षेत्र में नई मिसाल कायम कर रहा है।
India Success in Tiger Conservation || Image- The Guardian FILE
- भारत में दुनिया के सत्तर प्रतिशत जंगली बाघ मौजूद हैं।
- वैज्ञानिक संरक्षण से बाघों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही।
- तकनीक आधारित निगरानी ने संरक्षण व्यवस्था को और मजबूत बनाया।
नई दिल्ली: भारत ने विज्ञान आधारित नीतियों और मजबूत संस्थागत सहयोग के माध्यम से बाघ संरक्षण के क्षेत्र में विश्व भर में सबसे आगे अपनी पहचान बनाई है। अब देश विश्व के लगभग 70% जंगली बाघों का घर है। तकनीक-आधारित निगरानी, प्रभावी शासन और सामुदायिक भागीदारी ने संरक्षण को और मजबूत किया है। (India Success in Tiger Conservation) भारत बाघों और उनके प्राकृतिक आवासों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए वैश्विक सहयोग को भी बढ़ावा दे रहा है।
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फलते-फूलते बाघ, मज़बूत पारिस्थितिकी तंत्र
हर साल 29 जुलाई को मनाया जाने वाला ‘अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस’ बाघ संरक्षण के वैश्विक महत्व को उजागर करता है। भारत के लिए, यह विज्ञान-आधारित संरक्षण और सतत विकास के प्रति सरकार की दीर्घकालिक प्रतिबद्धता को दोहराता है। यह दिन भारत की उल्लेखनीय संरक्षण उपलब्धियों को भी प्रदर्शित करता है। आज, भारत में दुनिया की सबसे बड़ी जंगली बाघों की आबादी है, जो वैश्विक स्तर पर सभी जंगली बाघों का लगभग 70% है। यह सफलता दशकों के निरंतर नीतिगत समर्थन, वैज्ञानिक प्रबंधन और सामुदायिक भागीदारी को दर्शाती है, जिससे भारत बाघ संरक्षण में एक वैश्विक अग्रणी के रूप में स्थापित हुआ है।
यह उपलब्धि बाघ के साथ भारत के गहरे सांस्कृतिक और पारिस्थितिक जुड़ाव पर आधारित है। सदियों से, पुराने सिक्कों, शाही मुहरों और मंदिरों की नक्काशी में बाघ को ताकत और प्रभुत्व के प्रतीक के रूप में दिखाया गया है। इस लंबे समय से चली आ रही विरासत को पहचानते हुए, सरकार ने 1972 में रॉयल बंगाल टाइगर को राष्ट्रीय पशु घोषित किया। आज भी, बाघ भारत की समृद्ध जैव-विविधता, पारिस्थितिक संपदा और विविध इलाकों में फैली साझा प्राकृतिक विरासत का प्रतिनिधित्व करता है।
बाघ का सांस्कृतिक महत्व तो है ही, साथ ही यह पारिस्थितिकी तंत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। शीर्ष शिकारी और ‘अंब्रेला प्रजाति’ (संरक्षण छत्र) होने के नाते, यह स्वस्थ वन पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने में सहायक होता है। बाघों के प्राकृतिक आवासों का संरक्षण वनों, नदियों और अनगिनत अन्य प्रजातियों की रक्षा करता है। ये वन जल नियंत्रण, मृदा संरक्षण करते हैं, परागण में सहयोग प्रदान करते हैं और स्थानीय जलवायु को संतुलित रखते हैं। ये आपदा जोखिम को भी कम करते हैं और पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएं प्रदान करते हैं जो ग्रामीण आजीविका और शहरी अर्थव्यवस्थाओं को आधार देती हैं। बाघों और उनके आवासों की रक्षा करके, सरकार जैव विविधता संरक्षण को मजबूत कर रही है, पारिस्थितिक सुरक्षा को बढ़ा रही है और सतत विकास के माध्यम से ‘विकसित भारत’ के संकल्प को आगे बढ़ा रही है।
क्या आप जानते हैं?
अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस की शुरुआत नवंबर 2010 में आयोजित ‘सेंट पीटर्सबर्ग टाइगर समिट’ से हुई थी। भारत सहित 13 बाघ-रेंज वाले देशों के नेताओं ने 2022 तक दुनिया भर में जंगली बाघों की आबादी को दोगुना करने का महत्वाकांक्षी ‘टीx2’ लक्ष्य अपनाया था। आज, यह संरक्षण की प्रगति की समीक्षा करने, अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करने और जागरूकता बढ़ाने के लिए एक वैश्विक मंच के रूप में कार्य करता है। 2010 में, विश्व स्तर पर केवल लगभग 3,200 जंगली बाघ होने का अनुमान था। (India Success in Tiger Conservation) 2022 तक, बेहतर संरक्षण और वैज्ञानिक निगरानी से यह अनुमान बढ़कर लगभग 4,500 हो गया, जिसमें 3,700 से 5,600 बाघों की संभावित सीमा शामिल है। हालिया वैश्विक अनुमानों के अनुसार, दुनिया भर में लगभग 5,711 जंगली बाघ हैं, जो 2010 के बाद से लगभग 78% की वृद्धि को दर्शाता है।
बाघों की संख्या में वृद्धि: संकट से उबरने तक का सफर
भारत की बाघ संरक्षण की कोशिशें वन्यजीवों की संख्या बढ़ाने के मामले में दुनिया के लिए एक मिसाल बन गई हैं। 2006 के बाद से देश में वैज्ञानिक तरीके से गिनी गई बाघों की संख्या दोगुनी से भी ज़्यादा हो गई है। ‘अखिल भारतीय बाघ अनुमान (2022)’ के अनुसार, भारत में बाघों की संख्या 3,682 है। 2022 के इस अखिल भारतीय बाघ अनुमान में 20 राज्यों को शामिल किया गया और 6.41 लाख किलोमीटर से अधिक का क्षेत्र पैदल तय करके सर्वेक्षण किया गया। यह दुनिया के सबसे बड़े और सबसे व्यापक वन्यजीव सर्वेक्षण में से एक है। बाघों की संख्या में यह शानदार बढ़ोतरी लगातार मिल रहे नीतिगत समर्थन, विज्ञान-आधारित संरक्षण और मज़बूत संस्थागत कामकाज का नतीजा है। लंबे समय तक प्राकृतिक आवास की सुरक्षा, कड़ी निगरानी और तालमेल के साथ काम करने से पूरे भारत में बाघ संरक्षण को और मज़बूती मिल रही है।
बाघ संरक्षण के लिए मजबूत प्रशासनिक ढांचा
भारत की बाघ संरक्षण नीति में लंबे समय की सोच और राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर लगातार संस्थागत सहयोग का मेल है। ‘प्रोजेक्ट टाइगर’, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) और बाघ संरक्षण योजनाएं मिलकर बाघों के प्राकृतिक आवास के लिए एक मज़बूत और विज्ञान आधारित प्रशासनिक ढांचा तैयार करते हैं।
प्रोजेक्ट टाइगर
‘प्रोजेक्ट टाइगर’ भारत सरकार की एक प्रमुख केंद्रीय प्रायोजित योजना है। इसे पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा लागू किया जाता है। इस योजना का मकसद बाघों की आबादी को उनके प्राकृतिक आवासों में सुरक्षित रखना है। (India Success in Tiger Conservation) यह संरक्षण के प्रयासों के लिए बाघ वाले राज्यों को वित्तीय और तकनीकी सहायता देता है। इस कार्यक्रम में आवास की सुरक्षा, वैज्ञानिक प्रबंधन और नियमित रूप से ज़मीनी स्तर पर निगरानी को शामिल किया गया है। इस तरीके ने समय के साथ संरक्षण के उपायों को मज़बूत किया है।
राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) की रिपोर्ट (2023) के अनुसार, ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ ने 18 बाघ-रेंज वाले राज्यों में 58 बाघ अभ्यारण्य का एक नेटवर्क स्थापित किया है। ये अभ्यारण्य लगभग 84,500 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को कवर करते हैं, जो भारत के भौगोलिक क्षेत्रफल का लगभग 2.56% है। आज, ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ भारत के वन्यजीव संरक्षण प्रयासों की एक आधारशिला बना हुआ है और यह बाघों तथा उनके प्राकृतिक आवासों की सुरक्षा के प्रति सरकार की दीर्घकालिक प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
क्या आप जानते हैं?
वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम , (डब्ल्यूपीए), 1972 की धारा 38 V (3) के तहत प्रत्येक राज्य सरकार के लिए प्रत्येक बाघ अभ्यारण्य के लिए एक ‘बाघ संरक्षण योजना’ तैयार करना अनिवार्य है। ऐसी योजनाओं को बाघ अभ्यारण्य की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए और बाघों, उनके साथ शिकार करने वाले अन्य जानवरों तथा उनका शिकार बनने वाले जानवरों की आबादी को बनाए रखने के लिए उपयुक्त आवास सुविधाएं प्रदान करनी चाहिए।
राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ और उससे जुड़ी संरक्षण पहलों के कार्यान्वयन की निगरानी करता है। एनटीसीए बाघ-रेंज वाले राज्यों को वैज्ञानिक, तकनीकी और वित्तीय मार्गदर्शन प्रदान करता है। यह ‘बाघ संरक्षण योजनाओं’ को मंजूरी देता है और अभ्यारण्य प्रबंधन के लिए मानक संचालन प्रक्रियाएं (एसओपी) जारी करता है। यह प्राधिकरण आवधिक आकलनों के माध्यम से बाघ अभ्यारण्य के प्रबंधन की निगरानी भी करता है। इसका विज्ञान आधारित दृष्टिकोण आवास संरक्षण में सुधार करता है, संरक्षण के परिणामों को बेहतर बनाता है और पूरे भारत में जंगली बाघों के लंबे समय तक बचे रहने में मदद करता है।
क्या आप जानते हैं? एनटीसीए की अध्यक्षता केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री करते हैं। इसमें संसद सदस्य, वरिष्ठ सरकारी अधिकारी और विशेषज्ञ भी शामिल होते हैं। यह प्राधिकरण बाघ संरक्षण का मार्गदर्शन करता है, बाघ अभ्यारण्य की देखरेख करता है और पूरे देश में ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ का प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित करता है।
टाइगर टास्क फोर्स
भारत सरकार ने संरक्षण नीतियों का पुनपरीक्षण करने और सुधारों की सिफारिश करने के लिए ‘टाइगर टास्क फोर्स’ का गठन किया था। टाइगर टास्क फोर्स ने भारत के बाघ संरक्षण ढांचे की समीक्षा की और महत्वपूर्ण नीतिगत सुधारों की सिफारिश की। इससे प्रशासनिक विशेषज्ञ, पारिस्थितिकीविद और सामुदायिक प्रतिनिधि एक मंच पर आये। (India Success in Tiger Conservation) टास्क फोर्स ने पारदर्शिता, सामुदायिक भागीदारी और ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ के लिए मजबूत संस्थागत सहयोग पर जोर दिया। इसकी सिफारिशों ने एक अधिक सुदृढ़ संरक्षण ढांचे को आकार दिया। इनके परिणामस्वरूप 2006 में वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम में महत्वपूर्ण संशोधन किए गए। इन संशोधनों ने राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) और वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो (डब्ल्यूसीसीबी) को वैधानिक निकायों के रूप में स्थापित किया।
भारत का बाघ संरक्षण ढांचा संस्थानों और सहकारी संघवाद पर आधारित एक मजबूत शासन मॉडल को दर्शाता है। यह एकीकृत दृष्टिकोण भारत की जैव विविधता को आगे बढ़ाते हुए बाघों के भविष्य को सुरक्षित करने में मदद कर रहा है।
क्या आप जानते हैं?
भारत के बाघ अभ्यारण्य ‘लैंडस्केप-आधारित संरक्षण दृष्टिकोण का पालन करते हैं। प्रत्येक अभ्यारण्य में एक ‘कोर क्षेत्र’ (जिसे क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट या संकटग्रस्त बाघ आवास भी कहा जाता है) और एक ‘बफर क्षेत्र’ शामिल होता है। कोर क्षेत्रों को सर्वोच्च स्तर की सुरक्षा प्राप्त होती है। बफर क्षेत्र संरक्षण और सतत आजीविका के बीच संतुलन बनाए रखते हैं। इसके अलावा, वन्यजीव गलियारे बाघ अभ्यारण्य को आपस में जोड़ते हैं, जिससे बाघों की सुरक्षित आवाजाही संभव होती है और पूरे क्षेत्र में उनकी स्वस्थ आबादी बनी रहती है।
भारत में बाघों की निगरानी और मूल्यांकन
भारत ने बाघों की आबादी की निगरानी और मूल्यांकन के लिए एक मजबूत, विज्ञान आधारित प्रणाली विकसित की है। यह दृष्टिकोण मैदानी सर्वेक्षणों, कैमरा ट्रैप, डिजिटल तकनीकों और वैज्ञानिक विश्लेषण को जोड़ता है। यह बाघों की आबादी, शिकार की प्रजातियों और आवास की गुणवत्ता पर विश्वसनीय डेटा उत्पन्न करता है। यह जानकारी साक्ष्य-आधारित संरक्षण नियोजन और अनुकूलनीय प्रबंधन का मार्गदर्शन करती है। (India Success in Tiger Conservation) निरंतर निगरानी आवास संरक्षण को मजबूत करती है और संपूर्ण बाघ क्षेत्रों में सुविचारित प्रबंधकीय निर्णयों को सक्षम बनाती है।
अखिल भारतीय बाघ अनुमान (एआईटीइ): दुनिया का सबसे बड़ा जैव विविधता सर्वेक्षण
एआईटीइ दुनिया का सबसे बड़ा जैव विविधता सर्वेक्षण है। हर चार साल में आयोजित होने वाले इस सर्वेक्षण का नेतृत्व एनटीसीए, भारतीय वन्यजीव संस्थान के सहयोग से करता है। यह सभी बाघ-समृद्ध राज्यों में बाघों की आबादी, सह-शिकारियों, बाघ का शिकार होने वाली प्रजातियों और आवास की गुणवत्ता का आकलन करता है। 2022 के मूल्यांकन में भारत का खुरदार जानवरों (अंगुलेट्स) का पहला देशव्यापी सर्वेक्षण भी शामिल था। इस अभ्यास ने सक्षम बाघों की आबादी को बनाए रखने के लिए स्वस्थ शिकार आबादी के महत्व पर प्रकाश डाला।
क्या आप जानते हैं? अखिल भारतीय बाघ अनुमान को दुनिया के सबसे बड़े जैव विविधता सर्वेक्षण के रूप में मान्यता प्राप्त है। एनटीसीए का ‘कैमरा ट्रैप सर्वेक्षण’ दुनिया के सबसे बड़े कैमरा ट्रैप वन्यजीव सर्वेक्षण के रूप में ‘गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड’ भी दर्ज कर चुका है। उन्नत प्रौद्योगिकियों और वैज्ञानिक निगरानी का यह संयोजन भारत के बाघ अनुमान को दुनिया में सबसे सटीक और कठोर सर्वेक्षणों में से एक बनाता है।
प्रौद्योगिकी आधारित निगरानी
भारत ने बाघों की निगरानी के हर चरण में उन्नत डिजिटल तकनीकों को एकीकृत किया है। बाघों की निगरानी प्रणाली-गहन संरक्षण और पारिस्थितिक स्थिति (एम-स्ट्राइप्स) क्षेत्र निगरानी के लिए जीपीएस, जीपीआरएस और रिमोट सेंसिंग तकनीकों का उपयोग करती है। जीपीएस टैग वाली तस्वीरें डेटा की सटीकता बढ़ाती हैं और मानवीय त्रुटियों को कम करती हैं। यह प्लेटफॉर्म वैज्ञानिक विश्लेषण और सूचित निर्णय लेने के लिए क्षेत्र के अवलोकनों को एक केंद्रीय डेटाबेस में एकीकृत करता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता निगरानी को और मजबूत बनाती है। कैमरा ट्रैप डेटा रिपॉजिटरी और विश्लेषण उपकरण (कैट्रैट) कैमरा ट्रैप छवियों को प्रजातियों के अनुसार स्वचालित रूप से वर्गीकृत करता है। ‘एक्सट्रैक्टकम्पेयर’ अद्वितीय धारीदार पैटर्न का उपयोग करके अलग-अलग बाघों की पहचान करता है। ये सभी उपकरण मिलकर बाघों की जनसंख्या के अनुमानों की सटीकता और विश्वसनीयता में सुधार करते हैं।
प्रबंधन प्रभावशीलता मूल्यांकन (एमईई)
एमईई यह आकलन करता है कि बाघ अभ्यारण्य का प्रबंधन कितनी अच्छी तरह किया जा रहा है। यह ढांचा नियोजन, सुरक्षा, प्रबंधन प्रक्रियाओं और संरक्षण के परिणामों का मूल्यांकन करता है। यह प्रबंधन की कमियों को पहचानने और जवाबदेही को मजबूत करने में मदद करता है। 2022 तक, इस ढांचे के तहत 51बाघ अभ्यारण्यों का मूल्यांकन किया जा चुका था। (India Success in Tiger Conservation) बारह अभ्यारण्यों को ‘उत्कृष्ट’ रेटिंग मिली, जबकि औसत प्रबंधन स्कोर 78% तक पहुंच गया। ये निष्कर्ष नीतिगत निर्णयों का मार्गदर्शन करते हैं, अभ्यारण्यों के प्रबंधन को मजबूत करते हैं और दीर्घकालिक संरक्षण नियोजन का समर्थन करते हैं।
बाघ संरक्षण में भारत का वैश्विक नेतृत्व
भारत बाघ और वन्यजीव संरक्षण को मजबूत करने के लिए दुनियाभर के देशों के साथ सक्रिय रूप से सहयोग कर रहा है। प्रमुख साझेदारियों में नेपाल और भूटान के साथ सीमा पार जैव विविधता संरक्षण शामिल है। म्यांमार के साथ किया जा रहा सहयोग लकड़ी की तस्करी से निपटने और बाघों तथा अन्य वन्यजीवों के संरक्षण पर केंद्रित है। भारत कैमरा ट्रैप डेटा प्रबंधन पर और ‘बाघ एवं तेंदुए के संरक्षण पर भारत-रूस कार्य उप-समूह’ के माध्यम से रूस के साथ भी सहयोग करता है। बोत्सवाना, दक्षिण अफ्रीका, ग्वाटेमाला, कंबोडिया, केन्या और नामीबिया के साथ साझेदारियां वन्यजीव संरक्षण, प्रबंधन और जैव विविधता के संवहनीय उपयोग को मजबूत करती हैं। भारत ने बाघ संरक्षण पर चीन के साथ द्विपक्षीय सहयोग भी स्थापित किया है। ये साझेदारियां विज्ञान, सहयोग और साझा कार्रवाई के माध्यम से वैश्विक वन्यजीव संरक्षण के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को और मजबूत करती हैं।
इंटरनेशनल बिग कैट एलायंस (आईबीसीए)
आईबीसीए 95 बिग कैट (व्याघ्र प्रजाति) रेंज और साझेदार देशों, वैज्ञानिक संगठनों तथा संरक्षण साझेदारों का एक वैश्विक गठबंधन है। यह गठबंधन सात व्याघ्र प्रजातियों —बाघ, शेर, तेंदुआ, हिम तेंदुआ, चीता, जगुआर और प्यूमा के संरक्षण के लिए सहयोग को बढ़ावा देता है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 12 मार्च 2024 को इसकी स्थापना को मंजूरी दी थी और इसका सचिवालय भारत में स्थित है। भारत के वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त बाघ संरक्षण अनुभव के आधार पर, आईबीसीए व्याघ्र प्रजातियों और उनके प्राकृतिक आवासों की सुरक्षा के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करता है।
ग्लोबल टाइगर फ़ोरम (जीटीएफ)
जीटीएफ दुनिया का एकमात्र ऐसा अंतर-सरकारी संगठन है जो पूरी तरह से बाघों के संरक्षण के लिए समर्पित है। इसका मुख्यालय नई दिल्ली में है और यह संगठन बाघों वाले 13 देशों—बांग्लादेश, भूटान, कंबोडिया, चीन, भारत, इंडोनेशिया, लाओ पीडीआर, मलेशिया, म्यांमार, नेपाल, रूस, थाईलैंड और वियतनाम—को एक मंच पर लाता है। यह फ़ोरम बाघों, उनके शिकार और उनके प्राकृतिक आवासों के संरक्षण के लिए एक साझा तरीका अपनाता है। (India Success in Tiger Conservation) यह सदस्य देशों में बाघ संरक्षण को मज़बूत करने के लिए बड़े पैमाने पर संरक्षण (लैंडस्केप-स्केल कंजर्वेशन), क्षेत्रीय क्षमता निर्माण और तकनीकी इनोवेशन में मदद करता है। जानकारी साझा करने और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के ज़रिए, जीटीएफ वैश्विक बाघ संरक्षण में भारत के नेतृत्व को और मज़बूत करता है।
एकीकृत बाघ आवास संरक्षण कार्यक्रम (आईटीएचसीपी)
आईटीएचसीपी प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ (आईयूसीएन) की एक प्रमुख बाघ संरक्षण पहल है। यह कार्यक्रम जर्मन सरकार द्वारा ‘केएफडब्ल्यू डेवलपमेंट बैंक’ के माध्यम से वित्तपोषित है। यह एशिया में प्राथमिकता वाले बाघ परिदृश्यों में विज्ञान-आधारित संरक्षण परियोजनाओं का समर्थन करता है। यह आवास संरक्षण, परिदृश्य-स्तरीय (लैंडस्केप-लेवल) संरक्षण और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देता है। भारत आईटीएचसीपी कार्यक्रमों में सक्रिय रूप से भाग लेता है, जिससे बाघों और उनके प्राकृतिक आवासों के संरक्षण के क्षेत्रीय प्रयासों को मजबूती मिलती है।
क्या आप जानते हैं?
कंजर्वेशन एश्योर्ड टाइगर स्टैंडर्ड्स एक वैश्विक प्रमाणन प्रणाली है, जो विशेष रूप से बाघ संरक्षण क्षेत्रों के प्रभावी प्रबंधन को सुनिश्चित करती है। इसे 2013 में जापान में आयोजित प्रथम एशियाई पार्क कांग्रेस में शुरू किया गया था। यह सुरक्षा, आवास प्रबंधन, सामुदायिक भागीदारी और वन्यजीव निगरानी के लिए मानक निर्धारित करता है। कंजर्वेशन एश्योर्ड टाइगर स्टैंडर्ड्स बाघों के लिए सुरक्षित, संवहनीय वातावरण तैयार करने और वैश्विक जैव विविधता को संरक्षित करने के प्रयासों का समर्थन करता है। कंजर्वेशन एश्योर्ड टाइगर स्टैंडर्ड्स ने 23 भारतीय टाइगर रिजर्वों को मान्यता दी है, जिससे संरक्षण में वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं का पालन सुनिश्चित होता है।
IBC24 News के लेटेस्ट Updates और ताजा समाचार के लिए हमारे WhatsApp ग्रुप से जुड़े
भारत की अंतरराष्ट्रीय साझेदारियां, सीमा के पार बाघों के संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयासों को मज़बूत कर रही हैं। जानकारी, तकनीक और बेहतरीन तौर-तरीकों को साझा करके, भारत बाघों और उनके प्राकृतिक आवासों की सुरक्षा के वैश्विक प्रयासों को आगे बढ़ा रहा है।
बाघों के लिए सुरक्षित भविष्य की ओर
भारत के लिए बाघों का संरक्षण, लगातार बदलने वाली और महत्वपूर्ण प्राथमिकता बनी हुई है। भविष्य को देखते हुए, भारत का लक्ष्य ऐसे आपस में जुड़े और जलवायु परिवर्तन का सामना करने में सक्षम बाघों के इलाके बनाना है, जो वन्यजीवों और लोगों, दोनों के लिए फायदेमंद हों। डेटा-संचालित निगरानी, तकनीक-सक्षम सुरक्षा और अग्रिम पंक्ति के कर्मचारियों के क्षमता निर्माण में निरंतर निवेश इस दृष्टिकोण को साकार करने में मदद करेगा। (India Success in Tiger Conservation) बाघों वाले अन्य देशों और वैश्विक सहयोगियों के साथ मिलकर काम करने से जानकारी साझा करने और संरक्षण के सामूहिक प्रयासों को मजबूत करने में भी मदद मिलेगी। ‘अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस’ नागरिकों, खासकर युवाओं को इस भविष्य-उन्मुख एजेंडे से जोड़ने का एक नियमित मौका देता है। भारत का लक्ष्य मजबूत नीतिगत दिशा को निरंतर कार्यान्वयन के साथ जोड़कर, अपनी बाघ संरक्षण यात्रा को वैश्विक नेतृत्व के मार्ग पर बनाए रखना है।
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