नयी दिल्ली, नौ सितंबर (भाषा) ‘ग्लोबल वार्मिंग’ में 2024 तक भारत का योगदान 0.05 डिग्री सेल्सियस से भी कम रहा है। हालांकि, यह अमेरिका, चीन, यूरोपीय संघ और रूस जैसे अधिक उत्सर्जन करने वाले देशों की तुलना में तो कम है, लेकिन ब्राजील, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसी अन्य औद्योगिक और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में ज्यादा है। एक अध्ययन रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है।
जिन देशों का विश्लेषण किया गया है उनमें से अमेरिका को ‘ग्लोबल वार्मिंग’ (वैश्विक ताप में वृद्धि) में सर्वाधिक योगदान देने वाला देश पाया गया, जिसका योगदान लगभग 0.27 डिग्री सेल्सियस था। इसके बाद चीन का स्थान है, जिसका योगदान 0.19 डिग्री सेल्सियस था।
इसमें यूरोपीय संघ का योगदान 0.17 डिग्री सेल्सियस था, जबकि रूस का योगदान 0.07-0.08 डिग्री सेल्सियस था।
ब्रिटेन के क्रैनफ़ील्ड विश्वविद्यालय के शोधार्थी वी.के. पटेल और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), खड़गपुर के पी.ए. टक्सल ने कहा कि भारत का अधिकतर योगदान हाल के दशकों में हुआ है और सर्वाधिक बढ़ोतरी 1990 के बाद देखी गई।
उन्होंने कहा कि भले ही मौजूदा ‘ग्लोबल वार्मिंग’ में देश का कुल योगदान अभी भी अपेक्षाकृत कम है, लेकिन हाल ही में हुई तेजी से बढ़ोतरी ऊर्जा प्रणाली को कार्बन मुक्त करने की बढ़ती अहमियत को दिखाती है।
‘एनवायर्नमेंटल रिसर्च कम्युनिकेशंस’ पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन से यह भी पता चला कि यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से ऊर्जा क्षेत्र में जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल से होने वाले कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन की वजह से हो रही है।
अध्ययन में यह भी पाया गया कि मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी गैसों के जरिए होने वाली गैर-कार्बन डाइऑक्साइड जनित ताप बढ़ोतरी (वार्मिंग) में खेती का मुख्य योगदान है। भारत के कुल योगदान में इन गैसों की हिस्सेदारी लगभग एक-तिहाई से 20 प्रतिशत हिस्से के बराबर है।
शोधार्थियों का कहना है कि शुरुआती दौर में औद्योगिक विकास करने वाले देशों की तुलना में भारत का गैस उत्सर्जन अत्यधिक विविध है।
भारत उन देशों में शामिल है जिन्होंने ‘ग्लोबल वार्मिंग’ में सबसे कम योगदान दिया है, फिर भी उष्णकटिबंधीय जलवायु और घनी आबादी जैसे कारणों से इसे इसके सर्वाधिक दुष्प्रभावों का सामना करना पड़ सकता है।
भाषा सुभाष संतोष
संतोष