भारत-अमेरिका व्यापार समझौता किसानों के लिए मृत्युदंड के समान: राजद सांसद सुधाकर सिंह

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भारत-अमेरिका व्यापार समझौता किसानों के लिए मृत्युदंड के समान: राजद सांसद सुधाकर सिंह

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  • Publish Date - February 14, 2026 / 03:26 PM IST,
    Updated On - February 14, 2026 / 03:26 PM IST

(अंजलि ओझा)

नयी दिल्ली, 14 फरवरी (भाषा) राष्ट्रीय जनता दल (राजद) सांसद सुधाकर सिंह ने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच हाल ही में हुआ अंतरिम व्यापार समझौता भारतीय किसानों के लिए “मौत की सजा” के समान है और इसका “सड़क से लेकर संसद तक” में विरोध किया जाएगा।

सिंह ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार किसान संगठनों से राय-मशविरा किए बिना ही इस समझौते पर आगे बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि अगर समझौते में पर्याप्त सुरक्षा उपाय शामिल नहीं किए गए, तो किसान संगठन इसके खिलाफ राष्ट्रव्यापी आंदोलन करेंगे।

सिंह संसद की कृषि संबंधी स्थायी समिति के सदस्य हैं। उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ को दिये साक्षात्कार में कहा, “यह समझौता भारत के किसानों के लिए ‘डेथ वारंट’ की तरह है। इसे देश के किसानों से राय-मशविरा किए बिना तैयार किया गया है।”

सिंह ने चेतावनी दी कि अगर सरकार उनकी चिंताओं को दूर किए बिना आगे बढ़ती है, तो विरोध-प्रदर्शन और तेज होंगे।

उन्होंने कहा, “जब भी मौका मिलेगा, हम संसद में और सड़कों पर, दोनों जगह विरोध जताएंगे। अगर जरूरी हुआ तो हम दिल्ली भी आएंगे।”

सिंह ने तर्क दिया कि रक्षा या ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में आयात जरूरी हो सकता है, लेकिन कृषि क्षेत्र को समान रूप से नहीं लिया जा सकता है, क्योंकि यह सीधे तौर पर खाद्य सुरक्षा और आजीविका से जुड़ा हुआ है।

उन्होंने कृषि क्षेत्र के लिए सुरक्षा उपायों के कमजोर होने के प्रभावों को रेखांकित करने के वास्ते 1965-67 के खाद्य संकट का जिक्र किया और कहा, “व्यापार समझौते को देखें, तो हम कई बातों पर सहमत हो सकते हैं। लेकिन कृषि क्षेत्र अलग है। हम न केवल उपभोक्ता हैं, बल्कि उत्पादक और निर्यातक भी हैं।”

सिंह ने पिछले व्यापार समझौतों का हवाला देते हुए दावा किया कि आसियान समझौते के कारण खाद्य तेल के आयात में वृद्धि होने से भारतीय किसानों को नुकसान हुआ था। उन्होंने कहा कि दक्षिण भारत में रबर उत्पादकों को भी परेशानी का सामना करना पड़ा था।

उन्होंने विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) का जिक्र करते हुए कहा, “हमारा अनुभव यह है कि द्विपक्षीय व्यापार समझौते किसानों के लिए फायदेमंद नहीं होते हैं। डब्ल्यूटीओ का ढांचा पहले से ही मौजूद है।”

सिंह ने दावा किया कि प्रस्तावित समझौते पर सरकार के संदेश में स्पष्टता की कमी है।

उन्होंने कहा, “सुबह एक बयान आता है, दोपहर में दूसरा और शाम को तीसरा। यहां तक ​​कि अमेरिका से भी बयान आ रहे हैं कि कृषि उत्पाद भारत में शून्य ‘टैरिफ’ पर निर्यात किए जा सकते हैं। ऐसे में कोई कैसे कह सकता है कि कृषि क्षेत्र प्रभावित नहीं होगा?”

सिंह ने आगाह किया कि ‘गैर-टैरिफ’ बाधाओं को हटाने से भारत के पौध संरक्षण और बीज नियमों में बदलाव आ सकते हैं, जिसे लेकर किसान चिंतित हैं।

राजद सांसद ने इस मुद्दे को लंबित कृषि कानूनों से जोड़ते हुए कहा कि बीज विधेयक, कीटनाशक विधेयक और बिजली (संशोधन) विधेयक पर संसद की स्थायी समिति की ओर से विचार किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा, “संसद दो तरह से काम करती है, सत्र के माध्यम से और समितियों के जरिये। समितियों का मकसद विस्तृत चर्चा करना है। हम महीनों से अनुरोध कर रहे हैं, लेकिन सरकार सहमत नहीं हो रही है।”

भाषा पारुल धीरज

धीरज