नयी दिल्ली, छह अगस्त (भाषा) उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश विक्रम नाथ ने बृहस्पतिवार को कहा कि जिस प्रकार नागरिकों से संस्थाओं का सम्मान करने की अपेक्षा की जाती है, उसी प्रकार संस्थाओं को भी उन्हें सौंपे गए अधिकारों के प्रति जवाबदेह होना चाहिए और सवालों का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ‘एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन’ द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने कहा कि न्याय, निष्पक्षता और पारदर्शिता केवल फैसलों, भाषणों या कानून की भाषा तक सीमित नहीं रह सकती।
उन्होंने कहा, ‘‘हम अभूतपूर्व दौर से गुजर रहे हैं। आज लोग अपने अधिकारों और उन संस्थाओं के प्रति पहले से कहीं अधिक जागरूक हैं, जो उनपर शासन करते हैं। यह बदलाव लंबे समय से अपेक्षित था।’’
न्यायमूर्ति नाथ ने कहा, ‘‘संस्थाओं को सवालों का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए। यही उनकी ताकत है, कमजोरी नहीं, लेकिन बढ़ती जागरूकता के साथ अपेक्षाएं भी बढ़ती हैं और यह स्वाभाविक है।’’
उन्होंने कहा कि यदि नागरिकों से संस्थाओं का सम्मान करने की अपेक्षा की जाती है, तो संस्थाओं को भी जवाबदेही के लिए तैयार रहना चाहिए।
उन्होंने कहा कि अदालतों को अक्सर अधिकारों का संरक्षक कहा जाता है, लेकिन यह जिम्मेदारी केवल न्यायाधीशों की नहीं है।
उन्होंने कहा, “न्याय एक सामूहिक प्रयास है। वकील, न्यायालय के कर्मचारी और न्यायिक प्रक्रिया में शामिल प्रत्येक व्यक्ति वादी के अनुभव को प्रभावित करता है। वकील का दायित्व केवल अपने मुवक्किल के पक्ष में आदेश या निर्णय हासिल करने तक सीमित नहीं है। उसकी अदालत और न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता के प्रति भी जिम्मेदारी है। मजबूत संस्था साझा जिम्मेदारी और आपसी समझ से बनती हैं।’’
हाल ही में उच्चतम न्यायालय में नियुक्त न्यायमूर्ति वी. मोहना ने भी कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि यदि न्याय केवल उन्हीं लोगों तक सीमित रहे जो अदालत तक पहुंचने, वकील करने या जटिल कानूनी व्यवस्था को समझने का खर्च उठा सकते हैं, तो उसे वास्तव में समावेशी नहीं कहा जा सकता।
उन्होंने कहा कि न्याय तक पहुंच का अर्थ केवल अदालत तक भौतिक पहुंच नहीं है, बल्कि अदालत में अपनी बात प्रभावी ढंग से रखने का अवसर मिलना भी है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के उपयोग पर उन्होंने कहा कि यह न्यायिक प्रक्रिया में सहायक हो सकती है, लेकिन न्याय प्रदान करने वाले मानवीय विवेक का स्थान नहीं ले सकती।
उन्होंने कहा, “मानवीय निगरानी, न्यायिक स्वतंत्रता, पारदर्शिता, जवाबदेही, निष्पक्षता, निर्णयों की स्पष्ट व्याख्या और व्यक्तिगत आंकड़ों की सुरक्षा तकनीकी नवाचार के केंद्र में बनी रहनी चाहिए। हम इसी दिशा में प्रयास कर रहे हैं। संविधान का संकल्प तभी पूरा होगा, जब न्याय वास्तव में सभी के लिए सुलभ होगा।’’
भाषा सुभाष सुरेश
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