पीएमएलए मामले में ईसीआईआर उपलब्ध कराना जरूरी नहीं; गिरफ्तारी के आधार का खुलासा करना काफी: न्यायालय

पीएमएलए मामले में ईसीआईआर उपलब्ध कराना जरूरी नहीं; गिरफ्तारी के आधार का खुलासा करना काफी: न्यायालय

पीएमएलए मामले में ईसीआईआर उपलब्ध कराना जरूरी नहीं; गिरफ्तारी के आधार का खुलासा करना काफी: न्यायालय
Modified Date: November 29, 2022 / 08:15 pm IST
Published Date: July 27, 2022 6:40 pm IST

नयी दिल्ली, 27 जुलाई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि प्रत्येक मामले में संबंधित व्यक्ति को प्रवर्तन मामला सूचना रिपोर्ट (ईसीआईआर) की प्रति उपलब्ध कराना ‘अनिवार्य नहीं है’ और किसी आरोपी को गिरफ्तार करते समय प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ) द्वारा इसके आधार का खुलासा किया जाना ही पर्याप्त है।

शीर्ष अदालत ने कहा कि धनशोधन निवारण अधिनियम, 2002 में परिकल्पित विशेष तंत्र के मद्देनजर दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) के तहत किसी ईसीआईआर को प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) से नहीं जोड़ा जा सकता।

अदालत ने 2002 के अधिनियम के कुछ प्रावधानों की वैधता को बरकरार रखते हुए कहा कि पीएमएलए विशेष कानून है और दीवानी कार्रवाई के साथ-साथ अभियोजन शुरू करने के उद्देश्य से जांच/पड़ताल की जटिलता को देखते हुए किसी मामले में ईसीआईआर उपलब्ध न कराने को गलत नहीं माना जा सकता।

न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर, न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी और न्यायमूर्ति सीटी रविकुमार की पीठ ने कहा कि यदि अपराध से अर्जित किसी संपत्ति और प्रक्रिया में शामिल किसी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई पर आगे बढ़ने के लिए आवश्यक जांच या पड़ताल से पहले इसका खुलासा किया जाता है तो इसका जांच या पड़ताल के अंतिम परिणाम पर ‘हानिकारक प्रभाव’ हो सकता है।

पीठ ने कहा, ‘व्यक्ति को उसकी गिरफ्तारी के आधार के बारे में सूचित किया जाता है तो यह संविधान के अनुच्छेद 22(1) का पर्याप्त अनुपालन है।’

संविधान का अनुच्छेद 22(1) कहता है कि गिरफ्तार किए गए किसी भी व्यक्ति को ऐसी गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी दिए बिना हिरासत में नहीं रखा जाएगा, और न ही उसे अपनी पसंद के किसी वकील से परामर्श करने और बचाव करने के अधिकार से वंचित किया जाएगा।

शीर्ष अदालत ने पीएमएलए के कुछ प्रावधानों की व्याख्या से संबंधित याचिकाओं पर अपना फैसला सुनाया।

इसने गिरफ्तारी, धनशोधन से जुड़ी संपत्ति की कुर्की और पीएमएलए के तहत तलाशी एवं जब्ती से संबंधित ईडी की शक्तियों को बरकरार रखा।

पीठ ने कहा कि ईसीआईआर ईडी का एक आंतरिक दस्तावेज है और यह तथ्य कि संबंधित अपराध में प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई है, अपराध से अर्जित संपत्ति को अस्थायी रूप से कुर्क करने के लिए दीवानी कार्रवाई शुरू करने के वास्ते जांच/पड़ताल शुरू करने के लिए धारा 48 में संदर्भित प्राधिकारों के आड़े में नहीं आता।

इसने कहा, ‘हर मामले में संबंधित व्यक्ति को ईसीआईआर की प्रति उपलब्ध कराना अनिवार्य नहीं है। अगर गिरफ्तारी के समय ईडी ऐसी गिरफ्तारी के आधार का खुलासा करता है तो यह पर्याप्त है।’

पीठ ने कहा कि विशेष अदालत के समक्ष जब गिरफ्तार व्यक्ति को पेश किया जाता है, तो वह ईडी द्वारा प्रस्तुत प्रासंगिक रिकॉर्ड देख सकती है तथा वही धनशोधन के कथित अपराध के संबंध में व्यक्ति को लगातार हिरासत में रखे जाने पर फैसला करेगी। न्यायालय ने ईडी नियमावली के उपयोग संबंधी अस्पष्टता के बारे में किए गए अभिवेदन पर भी विचार किया।

पीठ ने कहा कि 2002 अधिनियम की धारा 19(1) में कहा गया है कि गिरफ्तारी के बाद, जितनी जल्दी हो सके, व्यक्ति को इस तरह की गिरफ्तारी के आधार के बारे में सूचित किया जाना चाहिए और यह शर्त संविधान के अनुच्छेद 22(1) के अनुरूप है।

इसने कहा कि ईसीआईआर उपलब्ध न कराना, जो अनिवार्य रूप से ईडी का एक आंतरिक दस्तावेज है, को संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन के रूप में उद्धृत नहीं किया जा सकता।

भाषा नेत्रपाल नरेश

नरेश


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