नयी दिल्ली, नौ सितंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को भारतीय व्यापार सेवा (आईटीएस) के एक पूर्व अधिकारी को सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले लाभ और पेंशन प्रदान किए जाने का आदेश दिया। इस अधिकारी को सेवानिवृत्ति की तय तारीख से पांच साल से कम समय पहले अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त कर दिया गया था। इसने केंद्र सरकार पर 15 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया।
न्यायालय ने कहा कि जिस अधिकारी ने अपनी ज़िंदगी के सबसे अच्छे साल देश की सेवा में लगा दिए, उसे ‘‘बेकार’’ बताना और जनहित का बहाना बनाकर नौकरी से निकालना, गहरी दुर्भावना को दिखाता है।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने यह भी निर्देश दिया कि पूर्व आईटीएस अधिकारी एस.एस. दास को विदेश व्यापार महानिदेशक द्वारा वापस कार्यालय बुलाया जाए और उन्हें पूरे सम्मान के साथ विदाई दी जाए।
आईटीएस में दास का करियर शानदार रहा, जिसमें उन्हें समय पर पदोन्नति मिली और उनकी वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (एसीआर) लगातार बेहतरीन रहीं।
बेदाग़ सेवा रिकॉर्ड होने के बावजूद, उन्हें सेवानिवृत्ति की सामान्य उम्र तक पहुँचने से पहले ही मौलिक नियम 56(जे) के तहत अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त कर दिया गया। यह नियम जनहित में ऐसी कार्रवाई की अनुमति देता है।
दास ने केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) और दिल्ली उच्च न्यायालय में इस आदेश को चुनौती दी, लेकिन दोनों ने ही इसे खारिज कर दिया।
शीर्ष अदालत ने दास की अपील स्वीकार करते हुए पूर्व अधिकारी को सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले लाभ और पेंशन प्रदान किए जाने जाने का आदेश दिया।
इसने कहा, ‘‘इस तरह, अपील मंज़ूर की जाती है और प्रतिवादी को अपीलकर्ता को छह लाख रुपये का खर्च देना होगा। अपीलकर्ता की प्रतिष्ठा को हुए नुकसान के लिए, हम प्रतिवादी को आदेश देते हैं कि वह उसे नौ लाख रुपये की अतिरिक्त राशि का मुआवज़ा दे।’’
भाषा
नेत्रपाल
नेत्रपाल