नयी दिल्ली, 30 सितंबर (भाषा) वरिष्ठ टीवी पत्रकार अजीत अंजुम ने विधायकों के विधायी विशेषाधिकारों के दायरे और अभिव्यक्ति की आजादी पर इसके असर से जुड़े प्रावधानों की व्याख्या से संबंधित एक मामले में हस्तक्षेप करने की अनुमति के लिए उच्चतम न्यायालय का रुख किया है।
इससे पहले, स्टैंड-अप कॉमेडियन कुणाल कामरा और पत्रकार सीमा चिश्ती ने भी शीर्ष अदालत का रुख किया था और इस बारे में कानूनी सवालों पर उससे दखल देने और मदद करने की अनुमति मांगी थी। अदालत से यह जानना चाहा गया है कि राज्य विधानसभाओं की विशेष शक्तियां और विशेषाधिकार किस हद तक बढ़ाए जा सकते हैं, खासकर तब जब ये शक्तियां अभिव्यक्ति की आज़ादी और व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे मौलिक अधिकारों से टकराती हैं।
सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ विधायकों के विधायी विशेषाधिकारों के दायरे और बोलने तथा अभिव्यक्ति की आजादी पर उनके असर से जुड़े प्रावधानों की व्याख्या पर छह अक्टूबर को सुनवाई शुरू करेगी।
अंजुम ने ‘द हिंदू’ के पत्रकार एन. रवि द्वारा तमिलनाडु विधानसभा के खिलाफ 2003 में दायर याचिकाओं में दखल देने की अर्जी दाखिल की है। विधानसभा ने विशेषाधिकार हनन के आरोप में राम और अन्य को 15 दिन की साधारण कैद की सज़ा सुनाई थी।
अदालत ने अपने 12 अगस्त, 2026 के आदेश में अनुच्छेद 194(3) के तहत विधायी विशेषाधिकारों की सीमाओं और अनुच्छेदों 19(1)(ए) और 21 के साथ उनके आपसी संबंध से जुड़े अहम सवालों की पहचान की थी।
वकील नेहा राठी के जरिए दायर अपनी अर्जी में अंजुम ने कहा कि इस मामले का असर व्यक्तिगत याचिकाकर्ताओं से जुड़े विवाद से कहीं ज़्यादा है।
उनका कहना है कि यह कार्यवाही विधायिका, न्यायपालिका और स्वतंत्र प्रेस के बीच संवैधानिक संबंधों से जुड़ी है।
याचिका में शीर्ष अदालत से आग्रह किया गया है कि वह विधायी विशेषाधिकार के दायरे और सीमाओं की जांच करे; यह देखे कि विधायी कार्यवाही की आलोचना या रिपोर्टिंग कब विशेषाधिकार हनन माना जा सकता है; विधायी निकायों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली दंडात्मक शक्तियों की स्वीकार्य सीमाएं क्या हैं; और विधायी निकायों की निष्पक्ष और सटीक रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों, प्रकाशकों और नागरिकों को क्या संवैधानिक सुरक्षा मिलती है।
विधायकों के विधायी विशेषाधिकारों के दायरे से जुड़े प्रावधानों की व्याख्या और अभिव्यक्ति की आज़ादी के मौलिक अधिकार के साथ उनके आपसी संबंध से जुड़ा मामला दिसंबर 2003 में पांच न्यायाधीशों की पीठ को सौंपा गया था।
मामला 2003 का है, जब पत्रकार एन रवि और अन्य ने उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। तमिलनाडु विधानसभा के तत्कालीन अध्यक्ष के. कलिमुथु ने विशेषाधिकार हनन और अवमानना के आरोप में उनकी गिरफ्तारी का आदेश दिया था।
तब उच्चतम न्यायालय ने छह पत्रकारों की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी और बाद में विरोधाभासी फैसलों को देखते हुए मामले को सात न्यायाधीशों की पीठ को सौंप दिया था।
एक फैसले में कहा गया था कि मौलिक अधिकारों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए, जबकि 1965 के फैसले में कहा गया था कि मौलिक अधिकार संसदीय विशेषाधिकारों के अधीन हैं।
भाषा वैभव माधव
माधव