न्यायपालिका आलोचना के विरूद्ध नहीं, बल्कि बिना जानकारी के किये गए दावों के खिलाफ है: न्यायालय

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न्यायपालिका आलोचना के विरूद्ध नहीं, बल्कि बिना जानकारी के किये गए दावों के खिलाफ है: न्यायालय

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  • Publish Date - September 9, 2026 / 03:58 PM IST,
    Updated On - September 9, 2026 / 03:58 PM IST

नयी दिल्ली, नौ सितंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि न्यायपालिका आलोचना के खिलाफ नहीं है और न ही वह हो सकती है, लेकिन ऐसी आलोचना सही मंच पर और निष्पक्ष व तर्कसंगत तरीके से की जानी चाहिए।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने यह टिप्पणी उस वक्त की, जब वे आठवीं कक्षा की राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के जिक्र से जुड़ी स्वत: संज्ञान वाली कार्यवाही को बंद कर रहे थे।

शीर्ष अदालत ने कहा कि फर्क आलोचना और चुप्पी के बीच नहीं, बल्कि जिम्मेदाराना विमर्श और बिना जानकारी के किये गए दावों के बीच है।

पीठ ने कहा, ‘‘एक संस्था के तौर पर न्यायपालिका आलोचना के खिलाफ नहीं है और न ही हो सकती है। न्यायिक कामकाज की निष्पक्ष और रचनात्मक आलोचना एक जीवंत संवैधानिक लोकतंत्र की वैध और आवश्यक विशेषता है, जो संस्थागत जवाबदेही और आत्म-सुधार में योगदान देती है।’’

पीठ ने अपने आदेश में कहा, ‘‘हालांकि, जरूरी यह है कि ऐसी आलोचना सही मंच पर और निष्पक्ष व तर्कसंगत तरीके से की जाए, न कि बिना जांच-पड़ताल के इसे स्कूल पाठ्यक्रम में शामिल कर दिया जाए।’’ एक सितंबर को जारी इस आदेश की सामग्री बाद में उपलब्ध हुई।

शीर्ष अदालत ने इस बात पर गौर किया कि केंद्र सरकार द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति के सुझावों के आधार पर उस विवादित अध्याय को बदल दिया गया है।

पीठ एनसीईआरटी की आठवीं कक्षा की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक से जुड़े एक स्वतः संज्ञान वाले मामले की सुनवाई कर रही थी, जिसमें न्यायपालिका में कथित भ्रष्टाचार के बारे में ‘‘आपत्तिजनक’’ सामग्री थी।

न्यायालय ने पूर्व में अपने 11 मार्च के उस आदेश में बदलाव किया था, जिसमें केंद्र, राज्यों और अन्य को न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर विवादित अध्याय को लेकर तीन शिक्षाविदों से दूरी बनाने का निर्देश दिया गया था।

शीर्ष अदालत ने उन तीन शिक्षाविदों की दलीलों पर विचार करने के बाद, केंद्र, राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों, सरकारी विश्वविद्यालयों और केंद्र या राज्य सरकारों से वित्त पाने वाले संस्थानों के लिए यह विकल्प खुला छोड़ दिया कि वे 11 मार्च के आदेश में की गई टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना इस मुद्दे पर स्वतंत्र रूप से निर्णय ले सकते हैं।

भाषा सुभाष संतोष

संतोष