कपूरथला महाराजा संपत्ति विवाद पर न्यायालय ने कहा, निजी संपत्ति पर लागू नहीं होता ज्येष्ठाधिकार नियम

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कपूरथला महाराजा संपत्ति विवाद पर न्यायालय ने कहा, निजी संपत्ति पर लागू नहीं होता ज्येष्ठाधिकार नियम

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  • Publish Date - May 27, 2026 / 08:49 PM IST,
    Updated On - May 27, 2026 / 08:49 PM IST

नयी दिल्ली, 27 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी नाममात्र के शासक की निजी संपत्ति उसके वारिसों में हिंदू या मुस्लिम पारिवारिक कानून के अनुसार बंटनी चाहिए और “ज्येष्ठाधिकार” (प्राइमोजेनिचर) की पुरानी परंपरा लागू नहीं होनी चाहिए, जिसमें परिवार का सबसे बड़ा बेटा या पुरुष वंशज सारी संपत्ति का अकेला मालिक बन जाता है।

न्यायमूर्ति पंकज मित्तल और न्यायमूर्ति एस वी एन भट्टी की पीठ ने कहा कि ज्येष्ठाधिकार का नियम प्रतीकात्मक गद्दी और उपाधियों पर लागू हो सकता है, लेकिन यह उन संपत्तियों पर लागू नहीं होगा जिन्हें रियासतों के विलय के दौरान निजी संपत्ति घोषित किया गया था।

उच्चतम न्यायालय सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त कपूरथला के नाममात्र के ‘महाराजा’ ब्रिगेडियर सुखजीत सिंह का उनकी अलग रह रहीं पत्नी गीता देवी व बच्चों से जारी दीवानी वाद पर सुनवाई कर रहा था।

सिंह का दावा है कि सबसे बड़े पुरुष वंशज होने के नाते वह परंपरागत कानून के तहत परिवार की सभी संपत्तियों के एकमात्र मालिक हैं और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम उनकी अविभाज्य संपत्ति पर लागू नहीं होता।

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि उसके समक्ष मुख्य प्रश्न यह है किसी शासक की वे संपत्तियां उत्तराधिकारियों में किस प्रकार बांटी जाएंगी, जो निजी संपत्ति घोषित की गईं हैं और सार्वजनिक संपत्तियों से अलग हैं।

अदालत ने कहा कि विलय समझौते पर रियासतों के हस्ताक्षर करने के बाद तत्कालीन शासक पूरी तरह संप्रभु नहीं रहे और उन्होंने भारत के एक सामान्य नागरिक का दर्जा ग्रहण किया।

उच्चतम न्यायालय ने कहा, “संविधान के अनुच्छेद 366(22) के तहत राष्ट्रपति द्वारा महाराजा को शासक के रूप में मान्यता देना एक राजनीतिक या कार्यकारी कदम था, जो औपचारिक उद्देश्यों के लिए था। इसके तहत महाराजा को प्रिवी पर्स (राजघरानों को दिया जाने वाला भत्ता) तथा उससे जुड़े अन्य विशेषाधिकार प्राप्त हुए, लेकिन संपत्ति के स्वामित्व का अधिकार तय नहीं हुआ।”

अदालत ने कहा कि देश में सामान्य धारणा रही है कि किसी रियासत के शासक या सम्राट की संपत्ति परंपरा के अनुसार ज्येष्ठाधिकार के नियम के तहत बांटी जाती है।

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि विलय समझौते पर हस्ताक्षर और कुछ संपत्तियों को महाराजा की निजी व्यक्तिगत संपत्ति घोषित किए जाने के बाद केवल प्रतीकात्मक गद्दी ही ज्येष्ठाधिकार के नियम के अनुसार सुपुर्ग होगी, न कि शासक की निजी व्यक्तिगत संपत्तियां।

उच्चतम न्यायालय ने कहा, “ब्रिटिश राज खत्म होने और विलय समझौते पर हस्ताक्षर के बाद महाराजा ने केवल नाममात्र के शासक का दर्जा ग्रहण किया, ताकि वे गद्दी के उत्तराधिकारी बन सकें और उससे जुड़े कुछ विशेषाधिकारों का लाभ उठा सकें…”

अदालत ने कहा कि शासक द्वारा घोषित निजी संपत्तियां उसके उत्तराधिकारियों को मुस्लिम/हिंदू व्यक्तिगत कानून के अनुसार या वर्तमान मामले में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार सुपुर्द होंगी न कि ज्येष्ठाधिकार के नियम के तहत।”

शीर्ष अदालत ने कहा कि विवादित चार अचल संपत्तियों में से तीन परिवार के सदस्यों के संयुक्त नाम पर हैं, इसलिए वे संयुक्त धारकों के बीच विभाजित की जाएंगी।

अदालत ने कहा, “केवल मसूरी में स्थित कपूरथला शैटो और सेंट हेलेंस ऐसी संपत्ति है हिंदू कानून के तहत उत्तराधिकारियों को हस्तांतरित होगी और परिवार के सदस्यों के बीच विभाजित की जा सकेगी।”

भाषा जोहेब माधव

माधव