कर्नाटक में एलएलए, एमएलसी के कैबिनेट दर्जे को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई से न्यायालय का इनकार

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कर्नाटक में एलएलए, एमएलसी के कैबिनेट दर्जे को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई से न्यायालय का इनकार

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  • Publish Date - May 26, 2026 / 02:11 PM IST,
    Updated On - May 26, 2026 / 02:11 PM IST

नयी दिल्ली, 26 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने कर्नाटक सरकार के उस फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार करने से मंगलवार को इनकार कर दिया जिसके तहत विभिन्न बोर्डों और निगमों के प्रमुख के रूप में विधानसभा और विधान परिषद के सदस्यों समेत 42 जनप्रतिनिधियों को कैबिनेट दर्जा दिया गया है।

भारत के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने याचिकाकर्ता से उच्च न्यायालय में पुनरीक्षण याचिका दायर करने को कहा।

पीठ ने कहा, ‘‘हम इस याचिका का निस्तारण करते हुए याचिकाकर्ता को उच्च न्यायालय के समक्ष पुनरीक्षण याचिका दायर करने की स्वतंत्रता देते हैं।’’

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेश्वर ने कहा कि उच्च न्यायालय द्वारा इस मामले को उतनी गंभीरता से नहीं लिया गया जितनी गंभीरता से इसे लिया जाना चाहिए था।

शीर्ष अदालत कर्नाटक राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में कार्यरत सूरी पायला की अपील पर सुनवाई कर रही थी। पायला ने कर्नाटक उच्च न्यायालय के चार मार्च के उस आदेश को चुनौती दी जिसमें उनकी याचिका खारिज कर दी गई थी।

उच्च न्यायालय ने कहा था, ‘‘हमें इस तर्क में भी दम लगता है कि यह याचिका पूरी तरह से जनहित में नहीं है बल्कि याचिकाकर्ता की कुछ पदों के लिए आकांक्षाओं के कारण भी दायर की गई है। यह सर्वविदित है कि जनहित याचिका दायर करने वाले याचिकाकर्ता को मुकदमे में अपने संभावित हित का खुलासा करना अनिवार्य है। इस मामले में याचिकाकर्ता ने अपेक्षित पूर्ण खुलासा नहीं किया।’’

याचिका में दलील दी गई थी कि इन जनप्रतिनिधियों को कैबिनेट दर्जा देने से उन्हें अधिक वेतन, सरकारी वाहन, चालक, ईंधन भत्ता, मकान किराया भत्ता और चिकित्सा प्रतिपूर्ति जैसे वित्तीय लाभ मिलते हैं।

याचिका में कहा गया कि यह ‘‘लाभ का पद’’ है और संविधान के अनुच्छेद 191 का उल्लंघन करता है जिसके तहत जनप्रतिनिधियों को ऐसे पद धारण करने से अयोग्य ठहराया जाता है।

याचिकाकर्ता ने कहा कि विधानसभा सदस्यों और विधान परिषद सदस्यों को विभिन्न बोर्डों और निगमों का अध्यक्ष नियुक्त करना अपने-आप में समस्या नहीं होता लेकिन उन्हें कैबिनेट दर्जा देना संविधान के अनुच्छेद 164(1ए) का उल्लंघन है, जो मंत्रिपरिषद के आकार को सीमित करता है ताकि सरकार का अनावश्यक विस्तार रोका जा सके।

याचिका में कहा गया कि 26 जनवरी, 2025 को राज्य सरकार ने एक आदेश जारी कर 34 जनप्रतिनिधियों को कैबिनेट दर्जा दिया था, जबकि आठ जनप्रतिनिधियों को पहले से यह दर्जा प्राप्त था। इससे एक ही सरकारी अधिसूचना के जरिए इतनी बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधियों को कैबिनेट स्तर के पद दिए जाने को लेकर चिंता पैदा हुई।

याचिका में कैबिनेट दर्जे वाली नियुक्तियों को इस आधार पर चुनौती दी गई थी कि ये संविधान के अनुच्छेद 102, 191 और 164 के साथ-साथ कर्नाटक विधानमंडल (अयोग्यता निवारण) अधिनियम, 1956 तथा जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 10 का उल्लंघन करती हैं।

भाषा

सिम्मी वैभव

वैभव