कर्नाटक में ‘घृणास्पद भाषण’ विधेयक की आवश्यकता नहीं, मौजूदा कानून पर्याप्त: केंद्रीय गृह मंत्रालय

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कर्नाटक में ‘घृणास्पद भाषण’ विधेयक की आवश्यकता नहीं, मौजूदा कानून पर्याप्त: केंद्रीय गृह मंत्रालय

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  • Publish Date - May 26, 2026 / 03:21 PM IST,
    Updated On - May 26, 2026 / 03:21 PM IST

बेंगलुरु, 26 मई (भाषा) केंद्रीय गृह मंत्रालय का मानना ​​है कि कर्नाटक का ‘‘घृणास्पद भाषण’’ पर अंकुश लगाने संबंधी विधेयक अभी आवश्यक प्रतीत नहीं होता और मौजूदा कानूनी ढांचा इस मुद्दे को हल करने के लिए पर्याप्त है।

मंत्रालय ने कर्नाटक सरकार को ‘कर्नाटक घृणास्पद भाषण एवं घृणा अपराध (रोकथाम) विधेयक, 2025’ पर अपने ‘केंद्र-राज्य प्रभाग’ के रुख से अवगत कराया।

राज्यपाल थावरचंद गहलोत द्वारा विधेयक को मंजूरी देने से इनकार किए जाने के बाद, कर्नाटक सरकार ने फरवरी में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की सहमति के लिए इसे गृह मंत्रालय को भेजा था।

भाजपा और जद (एस) के कड़े विरोध के बावजूद, यह विधेयक पिछले साल 19 दिसंबर को बेलगावी में समाप्त हुए शीतकालीन सत्र के दौरान राज्य विधानमंडल के दोनों सदनों द्वारा पारित किया गया था।

गृह मंत्रालय (केंद्र-राज्य प्रभाग) ने 12 मई को अपने पत्र में कहा, ‘‘इस मामले की पड़ताल केंद्र-राज्य प्रभाग में की गई है। इस संबंध में यह कहा जाता है कि जिन मुद्दों के समाधान का प्रयास किया जा रहा है, उनके हल के लिए भारतीय न्याय संहिता, 2023 और अन्य प्रचलित कानूनों में पहले से ही पर्याप्त रूप से प्रावधान शामिल हैं। राज्य स्तर पर अलग से कानून बनाने से कानूनों का दोहराव और एकरूपता की कमी हो सकती है।’’

इसमें कहा गया, ‘‘उपरोक्त बातों को ध्यान में रखते हुए, ऐसा महसूस होता है कि इस स्तर पर प्रस्तावित कानून की आवश्यकता प्रतीत नहीं होती, और मौजूदा कानूनी ढांचा चिंताओं को दूर करने के लिए पर्याप्त है।’’

केंद्र के पत्र के बाद, कर्नाटक के संसदीय कार्य एवं विधान विभाग ने 20 मई को राज्य के गृह विभाग को उक्त विधेयक पर टिप्पणी या स्पष्टीकरण देने के लिए पत्र लिखा, ताकि वह केंद्रीय गृह मंत्रालय को शीघ्र उत्तर दे सके।

इस विधेयक में घृणा अपराध के लिए एक वर्ष की कैद, जो सात वर्ष तक के लिए बढ़ाई जा सकती है, तथा 50,000 रुपये के जुर्माने का प्रस्ताव है। बार-बार अपराध करने पर अधिकतम सात वर्ष की कैद और एक लाख रुपये के जुर्माने की बात कही गई है।

भाजपा ने इस विधेयक को ‘‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा हमला’’ और ‘‘राजनीतिक प्रतिशोध का खतरनाक हथियार’’ करार दिया था।

जनवरी में राज्यपाल ने विधेयक को अपनी सहमति दिए बिना वापस भेज दिया था और कहा था कि इसका ‘‘संविधान द्वारा संरक्षित लोकतांत्रिक संवाद पर गंभीर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।’’

भाषा नेत्रपाल नरेश

नरेश