नयी दिल्ली, चार अगस्त (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा के खिलाफ सोशल मीडिया पर ‘‘अपमानजनक’’ पोस्ट करने के संबंध में अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह और आम आदमी पार्टी (आप) के अन्य नेताओं के खिलाफ शुरू की गई आपराधिक अवमानना कार्यवाही पर जवाब दाखिल करने के लिए उन्हें चार सप्ताह का समय दिया।
केजरीवाल की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील ने न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति रविंदर डुडेजा की पीठ को बताया कि उन्हें अब तक वह सामग्री नहीं मिली है जिसके आधार पर अवमानना का मामला शुरू किया गया है।
अन्य पक्षों की ओर से पेश वकीलों ने भी इसी तरह की बात कही।
इस पर पीठ ने रजिस्ट्री से कहा कि वह प्रतिवादियों को वह सामग्री उपलब्ध कराएं और कहा, ‘‘प्रतिवादी चार सप्ताह में अपना जवाब दाखिल करें।’’
अदालत ने ‘आप’ नेता गोपाल राय और पत्रकार सौरव दास को भी उस याचिका पर जवाब देने के लिए चार सप्ताह का समय दिया जिसमें राय और दास पर न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा के खिलाफ एक कथित ‘‘सोची-समझी सोशल मीडिया मुहिम’’ का हिस्सा बनने का आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई का अनुरोध किया गया था।
अदालत ने इस मामले की सुनवाई के लिए 21 सितंबर की तारीख तय की।
अदालत ने न्यायमूर्ति शर्मा द्वारा स्वत: संज्ञान लेते हुए केजरीवाल और अन्य नेताओं के खिलाफ शुरू किए गए अवमानना के मामले में 19 मई को उन्हें नोटिस जारी किया था और जवाब दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया था।
उस वक्त अदालत ने वरिष्ठ वकील राजदीपा बेहूरा को न्यायमित्र नियुक्त किया था।
न्यायमूर्ति शर्मा ने 14 मई को केजरीवाल, सिसोदिया, सिंह और ‘आप’ के अन्य नेताओं के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू की थी। ‘आप’ के अन्य नेताओं में दुर्गेश पाठक, सौरभ भारद्वाज और विनय मिश्रा शामिल हैं।
आबकारी नीति मामले में न्यायमूर्ति शर्मा के खिलाफ सोशल मीडिया पर किए गए ‘‘अपमानजनक’’ पोस्ट को लेकर यह कार्यवाही की गई थी।
न्यायाधीश ने ‘एक्स’ उपयोगकर्ता देवेश विश्वकर्मा के खिलाफ भी अवमानना की कार्यवाही शुरू की।
इसके बाद, वकील अशोक चैतन्य ने भी अवमानना की याचिका दायर की।
अदालत के अवमानना के आदेश में न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री ने उपलब्ध कानूनी उपाय अपनाने के बजाय उनकी छवि धूमिल करने के इरादे से सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ ‘‘सोची-समझी मुहिम’’ चलाई। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सभी आरोपियों को आरोपमुक्त करने के खिलाफ केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की याचिका पर अब कोई दूसरी पीठ सुनवाई करेगी।
न्यायाधीश ने ‘आप’ नेताओं के उन कई सोशल मीडिया पोस्ट पर आपत्ति जताई, जिसमें उन्हें ‘‘किसी राजनीतिक दल के प्रति निष्ठा रखने’’ और ‘‘उससे जुड़ाव रखने’’ का आरोप लगाया था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि वाराणसी के एक शिक्षण संस्थान में दिए गए उनके भाषण को कथित रूप से छेड़छाड़ कर बनाए गए भ्रामक वीडियो को साझा कर उन्हें निशाना बनाया गया।
उन्होंने इस मामले की अदालती कार्यवाही से जुड़े वीडियो क्लिप को व्यापक रूप से प्रसारित करने का भी जिक्र किया और कहा कि जिन लोगों पर अदालत की अवमानना का आरोप है वे एक ‘‘समानांतर विमर्श’’ गढ़ रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि ‘‘चुप रहना’’ न्यायिक संयम नहीं, बल्कि ‘‘एक प्रभावशाली वादी के सामने घुटने टेकने के समान’’ है।
अधीनस्थ अदालत ने आबकारी नीति मामले में 27 फरवरी को केजरीवाल, सिसोदिया और 21 अन्य लोगों को बरी कर दिया था।
न्यायमूर्ति शर्मा ने मामले में उन्हें बरी किए जाने के खिलाफ सीबीआई की याचिका पर सुनवाई से खुद को अलग करने के अनुरोध वाली उनकी याचिका खारिज कर दी थी, जिसके बाद केजरीवाल, सिसोदिया और पाठक ने न्यायमूर्ति शर्मा को एक पत्र लिखा था। पत्र में उन्होंने कहा था कि वे न तो खुद और न ही किसी वकील के माध्यम से उनके सामने पेश होंगे और ‘‘महात्मा गांधी के सत्याग्रह के मार्ग’’ पर चलेंगे।
न्यायमूर्ति शर्मा द्वारा सीबीआई की याचिका को अपनी अदालत से हटाने के बाद अब इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति मनोज जैन की अदालत में हो रही है।
भाषा सुरभि नरेश
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