केरल:अदालत ने नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में पूर्व सरकारी कर्मचारी की उम्रकैद की सजा बरकरार रखी

केरल:अदालत ने नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में पूर्व सरकारी कर्मचारी की उम्रकैद की सजा बरकरार रखी

Modified Date: September 17, 2026 / 02:02 pm IST
Published Date: September 17, 2026 2:02 pm IST

कोच्चि, 17 सितंबर (भाषा) केरल उच्च न्यायालय ने वर्ष 2009 में एक स्कूली छात्रा से केरलम और तमिलनाडु के अलग-अलग स्थानों पर 45 दिनों तक दुष्कर्म किए जाने के मामले में दोषी ठहराए गए राज्य सरकार के एक पूर्व कर्मचारी की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा।

न्यायमूर्ति राजा विजयराघवन वी. और न्यायमूर्ति के.वी. जयकुमार की पीठ ने कहा कि साढ़े 14 साल की लड़की का अपहरण करके उसे केरलम व तमिलनाडु के कई स्थानों पर ले जाया गया, जहां 36 वर्षीय आरोपी (सिंचाई विभाग का तत्कालीन कर्मचारी) ने करीब 45 दिनों तक उसका यौन उत्पीड़न किया।

पीठ ने कहा कि आरोपी ने नाबालिग लड़की को यह झांसा देकर अगवा किया था कि अगर वह किसी खास गिरजाघर में जाकर कुछ प्रार्थनाएं करेगी तो उसे भगवान का आशीर्वाद मिलेगा और वह 10वीं कक्षा की परीक्षा में अच्छे अंक हासिल कर सकेगी।

पीठ ने कहा, “अपीलकर्ता (आरोपी) छात्रा को कई स्थानों पर ले गया और उसे नुकसान पहुंचाने का डर दिखाकर उससे जबरन दुष्कर्म किया।”

उच्च न्यायालय ने आरोपी की दोषसिद्धि और सजा के खिलाफ दायर अपील खारिज करते हुए कहा, “मामले के तथ्यों, परिस्थितियों और साक्ष्यों पर सावधानीपूर्वक विचार करने के बाद हमारा मानना है कि अपीलकर्ता सजा में किसी तरह की नरमी का हकदार नहीं है।”

आरोपी ने दावा किया था कि उसे झूठे मामले में फंसाया गया है और लड़की अपनी इच्छा से उसके साथ गई थी।

अभियोजन पक्ष ने दलील दी थी कि लड़की को झूठे बहाने से अगवा किया गया और बाद में उसे नुकसान पहुंचाने की धमकी देकर अलग-अलग स्थानों पर उससे दुष्कर्म किया गया।

पीठ ने आरोपी के दावों को खारिज करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष अपीलकर्ता के खिलाफ आरोपों को साबित करने में सफल रहा है।

उच्च न्यायालय ने कहा, “पीड़िता का बयान पूरी तरह विश्वसनीय, स्वाभाविक और सत्य है। उसके बयान की पुष्टि चिकित्सकीय साक्ष्यों से भी होती है।”

पीठ ने कहा, “झूठा फंसाए जाने की बचाव पक्ष की कहानी असंभव है। सत्र न्यायाधीश ने मौखिक और दस्तावेजी दोनों तरह के साक्ष्यों की बारीकी से जांच के बाद उचित निष्कर्ष निकाला है। अपील में कोई दम नहीं है और इसे खारिज किया जाना चाहिए।”

भाषा जितेंद्र संतोष

संतोष


लेखक के बारे में