‘जमीन के बदले नौकरी’ मामले में सीबीआई की प्राथमिकी रद्द करने की लालू यादव की याचिका खारिज

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‘जमीन के बदले नौकरी’ मामले में सीबीआई की प्राथमिकी रद्द करने की लालू यादव की याचिका खारिज

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  • Publish Date - March 24, 2026 / 09:34 PM IST,
    Updated On - March 24, 2026 / 09:34 PM IST

नयी दिल्ली, 24 मार्च (भाषा) राष्ट्रीय जनता दल (राजद) प्रमुख लालू प्रसाद यादव को मंगलवार को उस वक्ता एक बड़ा झटका लगा जब दिल्ली उच्च न्यायालय ने उनके और उनके परिवार से जुड़े ‘‘जमीन के बदले नौकरी’’ मामले में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा दर्ज प्राथमिकी रद्द करने से इनकार कर दिया।

अदालत ने राजद प्रमुख लालू प्रसाद की इस दलील को खारिज कर दिया कि एजेंसी की कार्रवाई कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं, क्योंकि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए के तहत पूर्व अनुमति नहीं ली गई थी।

न्यायमूर्ति रविंदर डुडेजा ने अपने आदेश में कहा कि यह धारा 2018 में अमल में आई थी, जिसे भविष्य में प्रभावी बनाया गया था, जबकि आरोप 2004-2009 के हैं।

न्यायमूर्ति डुडेजा ने कहा कि अदालत एजेंसी की इस दलील से सहमत हुई कि यदि पूर्व अनुमोदन से संबंधित तकनीकी दलील पर देर से चुनौती की अनुमति दी जाए, तो यह आपराधिक न्याय के सुव्यवस्थित प्रशासन को बाधित करेगा।

न्यायमूर्ति डुडेजा ने पूर्व रेल मंत्री एवं बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री यादव की याचिका खारिज कर दी, जिसमें 2022, 2023 और 2024 में दायर तीन आरोपपत्रों और बाद के संज्ञान लेने के आदेशों को रद्द करने का अनुरोध भी किया गया था।

न्यायाधीश ने फैसला सुनाते हुए कहा, ‘याचिका में कोई दम नहीं है, इसलिए इसे खारिज किया जाता है।’

अधिकारियों ने बताया कि ‘‘जमीन के बदले नौकरी’’ का यह कथित मामला लालू प्रसाद के रेल मंत्री के कार्यकाल (2004 से 2009) के दौरान मध्य प्रदेश के जबलपुर में भारतीय रेलवे के पश्चिम मध्य जोन में की गई ‘ग्रुप डी’ नियुक्तियों से संबंधित है।

अधिकारियों के अनुसार, ये नियुक्तियां भर्ती किए गए लोगों द्वारा राजद प्रमुख के परिवार या सहयोगियों के नाम पर कथित तौर पर उपहार स्वरूप दी गई या हस्तांतरित की गई भूमि के बदले की गई थीं।

यादव ने दलील दी थी कि इस मामले में जांच, प्राथमिकी के साथ ही जांच और बाद में दाखिल आरोपपत्र कानूनी रूप से टिकते नहीं हैं, क्योंकि केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने भ्रष्टाचार निरोधक कानून की धारा 17ए के तहत पूर्व मंजूरी नहीं ली थी।

अदालत ने कहा कि धारा 17ए, 2018 में कानून बनने के बाद के मामलों में लागू होगी, इसलिए इसका असर उन अपराधों पर नहीं होगा, जो कथित तौर पर 2004 से 2009 के बीच हुए थे।

अदालत ने कहा कि पूर्व स्वीकृति का अभाव प्रारंभिक जांच, प्राथमिकी दर्ज किया जाना, जांच या संज्ञान आदेशों को अमान्य नहीं करता है।

अदालत ने यह भी कहा कि यह प्रावधान इस मामले पर लागू नहीं होता, क्योंकि कथित कृत्य यादव द्वारा रेल मंत्री के रूप में अपने आधिकारिक कार्यों या कर्तव्यों का निर्वहन करते समय की गई किसी भी सिफारिश या निर्णय से संबंधित नहीं था।

अदालत ने कहा, “धारा 17ए का दायरा लोक सेवक द्वारा अपने आधिकारिक कार्यों के निर्वहन में की गई सिफारिशों या लिये गए निर्णयों तक सीमित है। लेकिन इस मामले में, याचिकाकर्ता नियुक्ति संबंधी निर्णय लेने की स्थिति में नहीं था, बल्कि केवल प्रभावित कर सकता था।”

अदालत ने कहा, “अदालत के समक्ष अभियोजन का मामला नियुक्ति की औपचारिक कार्यवाही के लिए सक्षम रेलवे अधिकारियों को जिम्मेदार मानता है और उन अधिकारियों के विरुद्ध धारा 17ए के तहत मंजूरी प्राप्त की गई थी।’’

अदालत ने कहा, ‘‘क्या याचिकाकर्ता ने वास्तव में प्रभाव डाला या मौखिक निर्देश जारी किए, यह साक्ष्यों की पड़ताल का विषय है और इस चरण में इस बात का निर्णायक आधार नहीं बन सकता कि धारा 17ए लागे होने की स्थिति है या नहीं।’’

अदालत ने कहा कि मामले में बाद में मंजूरी दिये जाने से यादव का पूर्वाग्रह का दावा कमजोर हो गया और मामला आगे बढ़ चुका है।

सीबीआई ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि इसे आरोप तय होने के चरण में देरी से दायर किया गया था। उसने यह भी दलील दी कि धारा 17ए याचिकाकर्ता पर लागू नहीं होती।

अदालत ने कहा कि यादव जांच में शामिल हुए, वैधानिक उपायों का लाभ उठाया और कई संज्ञान आदेशों को अंतिम रूप लेने दिया।

अदालत ने उच्चतम न्यायालय के उस फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया है कि भ्रष्टाचार संवैधानिक शासन और भारतीय लोकतंत्र के मूलभूत मूल्यों के साथ-साथ विधि के शासन के लिए गंभीर खतरा है और इसलिए भ्रष्टाचार-रोधी कानूनों की व्याख्या भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को मजबूत करने के लिए की जानी चाहिए।

यह मामला 18 मई, 2022 को यादव और उनकी पत्नी, दो बेटियों, अज्ञात सरकारी अधिकारियों और निजी व्यक्तियों सहित अन्य लोगों के खिलाफ दर्ज किया गया था।

यादव (77) और अन्य आरोपी फिलहाल जमानत पर हैं।

इस मामले में भ्रष्टाचार के आरोप तय किए जाने को चुनौती देने वाली यादव की याचिका उच्च न्यायालय में लंबित है।

नौ जनवरी को निचली अदालत ने यादव, उनके परिवार के सदस्यों और अन्य लोगों के खिलाफ आरोप तय करने का आदेश दिया था।

अदालत ने 16 फरवरी को औपचारिक रूप से भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत उनके खिलाफ आरोप तय किए।

यादव ने खुद को निर्दोष बताया है।

भाषा अमित सुरेश

सुरेश