कब्जे और मुआवजे के भुगतान के बाद अधिग्रहित भूमि सरकार की धरोहर : शीर्ष अदालत

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कब्जे और मुआवजे के भुगतान के बाद अधिग्रहित भूमि सरकार की धरोहर : शीर्ष अदालत

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  • Publish Date - June 12, 2022 / 04:59 PM IST,
    Updated On - November 29, 2022 / 08:02 PM IST

नयी दिल्ली, 12 जून (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि भूमि अधिग्रहण कानून के तहत कब्जे और मुआवजे के भुगतान के बाद अधिग्रहित जमीन सरकार की धरोहर होती है, जो सभी तरह की बाधाओं से मुक्त होती है।

न्यायमूर्ति एम आर शाह और न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस की अवकाशकालीन पीठ ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के इस विचार से सहमति जताई कि इसके बाद भूमि पर कब्जा रखने वाले किसी भी व्यक्ति को अनधिकृत रूप से अतिक्रमण करने वाला माना जाना चाहिए।

शीर्ष अदालत उत्तर प्रदेश के एक नागरिक की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण द्वारा दो फरवरी को जारी उस नोटिस को चुनौती दी गई थी, जिसमें प्राधिकरण ने अधिसूचित क्षेत्र के तहत स्थित एक भूखंड से अनधिकृत अतिक्रमण हटाने के लिए कहा गया था।

शीर्ष अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता की भूमि का अधिग्रहण किया गया था, उसका कब्जा लिया गया था और भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 के तहत मुआवजे का भुगतान भी किया गया था।

न्यायालय ने कहा, ‘‘इस मामले में, याचिकाकर्ता को कब्जा करने और/ या कब्जा जारी रखने का कोई अधिकार नहीं है, क्योंकि अधिग्रहण के बाद, भूमि पूरी तरह से राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में है। उच्च न्यायालय ने हस्तक्षेप करने से सही ही इनकार किया है। हम उच्च न्यायालय के दृष्टिकोण से पूरी तरह से सहमत हैं।’’

पीठ ने कहा, ‘‘इसलिए, हम भारत के संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए उक्त आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं देखते हैं। तदनुसार, विशेष अनुमति याचिका खारिज की जाती है।’’

उच्च न्यायालय ने कहा था कि भूमि के अधिग्रहण और निर्णय पारित होने के बाद, भूमि सभी बाधाओं से मुक्त होकर सरकार के पास आ जाती है।

उत्तर प्रदेश सरकार ने दलील दी थी कि विचाराधीन भूमि का कब्जा 1996 में लिया गया था और यहां तक ​​कि राजस्व रिकॉर्ड की प्रविष्टि भी बदल दी गई थी, लेकिन याचिकाकर्ता ने फिर से भूमि पर अतिक्रमण कर लिया था।

भाषा सुरेश वैभव

वैभव