‘कानूनी पेशा गुंडागर्दी से कलंकित हुआ’: न्यायालय ने उप्र टोल प्लाजा मामले में वकीलों की आलोचना की

‘कानूनी पेशा गुंडागर्दी से कलंकित हुआ’: न्यायालय ने उप्र टोल प्लाजा मामले में वकीलों की आलोचना की

‘कानूनी पेशा गुंडागर्दी से कलंकित हुआ’: न्यायालय ने उप्र टोल प्लाजा मामले में वकीलों की आलोचना की
Modified Date: March 18, 2026 / 09:04 pm IST
Published Date: March 18, 2026 9:04 pm IST

नयी दिल्ली, 18 मार्च (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिला बार एसोसिएशन के सदस्यों को टोल प्लाजा में तोड़फोड़ करने और टोल कर्मचारियों की ओर से पेश हुए एक साथी वकील के कार्यालय में हंगामा करने के लिए कड़ी फटकार लगाते हुए कहा है कि इस तरह के ‘‘गुंडागर्दी के कृत्यों से कानूनी पेशा कलंकित हुआ है।’’

चौदह जनवरी को, हैदरगढ़ तहसील के टोल प्लाजा पर एक कार के गुजरने को लेकर हुए विवाद के दौरान प्रतापगढ़ निवासी अधिवक्ता रत्नेश शुक्ला पर कथित तौर पर पांच लोगों ने हमला किया था।

इस घटना के बाद विरोध में बड़ी संख्या में अधिवक्ता राष्ट्रीय राजमार्ग-731 के लखनऊ-सुल्तानपुर खंड पर स्थित टोल प्लाजा पर जमा हो गए और जबरन परिचालन ठप कर दिया।

बाद में, स्थानीय बार एसोसिएशन के भीतर एक प्रस्ताव पारित किया गया और प्रसारित किया गया कि कोई भी वकील आरोपी व्यक्तियों की ओर से पेश नहीं होगा।

प्रस्ताव पारित होने के बावजूद, अधिवक्ता मनोज शुक्ला ने आरोपी की ओर से जमानत याचिका दायर की और उसके बाद, बार एसोसिएशन के सदस्यों ने अभद्र व्यवहार किया और उक्त अधिवक्ता के कार्यालय के फर्नीचर में आग लगा दी गई।

इसके बाद आरोपियों ने उच्चतम न्यायालय में जमानत के लिए याचिका दायर की, क्योंकि निचली अदालत में उनका प्रतिनिधित्व करने के लिए कोई वकील तैयार नहीं था और उन्होंने मुकदमे को स्थानांतरित करने का भी अनुरोध किया।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने बाराबंकी बार के सदस्यों की भूमिका की निंदा की, जिन्होंने याचिकाकर्ता की ओर से जमानत याचिका दायर करने वाले वकील के कार्यालय में तोड़फोड़ आदि करके ‘‘गुंडागर्दी’’ की।

पीठ ने कहा, ‘‘उल्लिखित तथ्य बेहद दयनीय स्थिति को उजागर करते हैं। विधि पेशा, जिसे कभी एक सम्मानित पेशा माना जाता था, 14 जनवरी 2026 को टोल प्लाजा पर हुई झड़प के परिणामस्वरूप हुई गुंडागर्दी की घटनाओं से स्पष्ट रूप से कलंकित हो गया है।’’

उसने कहा, ‘‘वकीलों के बीच भाईचारे की भावना को हम समझ सकते हैं, लेकिन किसी भी तरह से हिंसा और अराजकता के कृत्यों को उचित नहीं ठहराया जा सकता। अनुशासनात्मक निकाय, अर्थात भारतीय विधिज्ञ परिषद से अपेक्षा की जाती है कि वह इस संबंध में उचित कदम उठाए।’’

भाषा शफीक सुरेश

सुरेश


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