नयी दिल्ली, एक अप्रैल (भाषा) विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को लेकर बुधवार को तीखी राजनीतिक बहस छिड़ गई। एक ओर जहां भाजपा ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और पारदर्शिता के लिए आवश्यक बताया, वहीं दूसरी ओर विपक्ष ने आरोप लगाया कि इससे अल्पसंख्यकों के अधिकारों में कटौती होगी और गैर-सरकारी संगठनों पर सरकार का नियंत्रण सख्त होगा।
विधेयक को बुधवार को लोकसभा के आधिकारिक एजेंडा में चर्चा के लिए सूचीबद्ध किया गया था, लेकिन इस पर सदन में चर्चा नहीं हुई।
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रीजीजू ने संवाददाताओं को बताया कि यह निर्णय विधायी प्राथमिकताओं पर आधारित था, न कि राजनीतिक कारणों से ऐसा किया गया।
उन्होंने संसद परिसर में संवाददाताओं से कहा, ‘‘यह कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं है। कई विधेयक पेश किए गए हैं, और हम स्थिति और समय के अनुसार उन पर विचार करते हैं। आंध्र प्रदेश से संबंधित विधेयक (अमरावती को राजधानी घोषित करने के लिए) अत्यावश्यक था, इसलिए इस पर आज चर्चा हुई।’’
रीजीजू ने कहा कि सरकार कानून बनाने में उचित प्रक्रिया का पालन करती है।
उन्होंने कहा, ‘‘विपक्ष जो आरोप लगा रहा है, उस पर ध्यान न दें। वास्तविकता देखें। हम नियमों के अनुसार कार्य करते हैं और आवश्यकतानुसार कानून लाते हैं। हम नियमों का उल्लंघन नहीं कर सकते। हम नियमों का पालन करते हैं।’’
संशोधन विधेयक का बचाव करते हुए भाजपा सांसद दिनेश शर्मा ने विपक्ष के इस आरोप को खारिज कर दिया कि विधेयक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाता है। उन्होंने कहा, ‘सरकार अल्पसंख्यकों और बहुसंख्यकों के बीच भेदभाव नहीं करती, जैसा विपक्ष करता है। राष्ट्रीय सुरक्षा सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है।’
शर्मा ने संसद भवन परिसर में मीडियाकर्मियों से कहा, ‘यदि गैर-सरकारी संगठनों द्वारा प्राप्त विदेशी निधियों का उपयोग सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करने, मीडिया और सोशल मीडिया पर गलत सूचना फैलाने या नक्सलवाद को बढ़ावा देने के लिए किया जाता है, तो राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में सरकार के लिए प्रतिबंध लगाना निश्चित रूप से आवश्यक है।’
भाजपा सांसद गुलाम अली खटाना ने कांग्रेस पर अल्पसंख्यकों को हाशिए पर धकेलने का आरोप लगाया। खटाना ने आरोप लगाया, ‘उन्होंने अल्पसंख्यकों को हाशिये पर धकेल दिया है, और अब वे उन्हें डराने-धमकाने की कोशिश कर रहे हैं। वे उन्हें वोट बैंक में बदलना चाहते हैं।’
हालांकि, विपक्षी दलों ने विधेयक का तीखा विरोध किया। कांग्रेस के नेतृत्व में कई विपक्षी सांसदों ने बुधवार को संसद भवन परिसर में विधेयक के खिलाफ प्रदर्शन किया और प्रस्तावित कानून को वापस लेने की मांग की।
‘‘गैर-सरकारी संगठनों और संस्थानों को निशाना बनाना बंद करो’ लिखे विशाल बैनर को लहराते हुए विपक्षी सांसदों ने सरकार के खिलाफ नारे लगाए और विधेयक को वापस लेने की मांग की।
विरोध प्रदर्शन में कांग्रेस के कई सांसद, सपा की डिंपल यादव और राम गोपाल यादव, आईयूएमएल के ईटी मोहम्मद बशीर, राकांपा (शप) की सुप्रिया सुले और आरएसपी के एनके प्रेमचंद्रन सहित अन्य लोग शामिल हुए।
विधेयक को लेकर कांग्रेस और कुछ अन्य विपक्षी दलों के सदस्यों के हंगामे के कारण बुधवार को लोकसभा की बैठक शुरू होने के पांच मिनट बाद ही दोपहर 12 बजे तक स्थगित कर दी गई।
कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने संशोधनों को ‘‘असंवैधानिक’’ करार दिया। उन्होंने कहा, ‘जब एफसीआरए संशोधन विधेयक पेश किया गया था, तब मैंने संवैधानिक सिद्धांतों के आधार पर इसका विरोध किया। यह मनमाना व दुर्भावनापूर्ण है। यह संवैधानिकता की कसौटी पर खरा नहीं उतरता।’
उन्होंने कहा कि यह संविधान के अनुच्छेद 14, 19 तथा 300ए (कानून के अधिकार के बिना किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जाएगा) का उल्लंघन करता है, इसलिए इसका कड़ा विरोध किया जाना चाहिए।
कांग्रेस सांसद हिबी ईडन ने कहा कि उनकी पार्टी इस विधेयक का विरोध करेगी, क्योंकि मौजूदा प्रावधान पहले से ही सख्त हैं। ईडन ने कहा, ‘यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि दिवंगत मदर टेरेसा द्वारा स्थापित एक संगठन का एफसीआरए पंजीकरण 2021 में रद्द कर दिया गया।’
समाजवादी पार्टी के नेता राम गोपाल यादव ने कहा कि सरकार के विधायी दृष्टिकोण से आम जनता को कोई लाभ नहीं हुआ है।
उन्होंने कहा, ‘‘यह सरकार जो भी विधेयक लाएगी, वह देश की जनता के खिलाफ होगा। अब तक पेश किए गए सभी विधेयक या तो कुछ पूंजीपतियों के पक्ष में हैं या कुछ खास समूहों के हितों की पूर्ति करते हैं।
सपा सांसद डिंपल यादव ने आरोप लगाया कि इस विधेयक का उद्देश्य संस्थानों पर नियंत्रण बढ़ाना है।
उन्होंने कहा, ‘‘एफसीआरए विधेयक में यह संशोधन इसलिए लाया जा रहा है ताकि सरकारी और गैर-सरकारी संस्थान सरकार की इच्छा के अनुसार कार्य करें। मेरा मानना है कि इसके माध्यम से सरकार उन संस्थानों पर अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है जो अच्छा काम कर रहे हैं। जो किया जा रहा है वह लोकतांत्रिक नहीं है।’’
सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा कि विदेशी निधि पर भाजपा के रुख में ‘‘गंभीर विरोधाभास’’ था। उन्होंने विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 लाने से पहले स्पष्टता की मांग की।
उन्होंने कहा, ‘‘जो पैसा विदेशों से ‘पीएम केयर्स फंड’ में आया था वो लौटाया जाएगा या उसको भी ऑडिट की तरह विशेष छूट देकर गटक लिया जाएगा।’’
विदेशी अंशदान (नियमन) अधिनियम (एफसीआरए) में संशोधन के लिए विधेयक 25 मार्च को लोकसभा में पेश किया गया था।
भाषा सुभाष अविनाश
अविनाश