नयी दिल्ली, 10 अगस्त (भाषा) विभिन्न न्यायाधिकरणों के अध्यक्षों और सदस्यों के चयन के लिए एक आयोग गठित करने के प्रावधान वाला विधेयक सोमवार को लोकसभा में विपक्ष के हंगामे के बीच चर्चा के बिना ही पारित कर दिया गया।
विधि एवं न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने ‘न्यायाधिकरण सुधार विधेयक, 2026’ को चर्चा एवं पारित करने के लिए पेश किया।
इस दौरान विपक्षी सदस्य अयोध्या के राम मंदिर से चढ़ावे की कथित चोरी पर चर्चा और प्रदर्शनकारी छात्रों पर पुलिस की कार्रवाई पर गृह मंत्री अमित शाह के जवाब की मांग को लेकर नारेबाजी कर रहे थे।
मेघवाल ने कहा कि यह विधेयक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देश में चल रही ‘सुधार एक्सप्रेस’ का हिस्सा है।
उन्होंने कहा कि यह विधेयक न्यायाधिकरणों के अधिकार क्षेत्र बदलने का विधेयक नहीं है, बल्कि इसका प्रमुख उद्देश्य विभिन्न न्यायाधिकरणों के अध्यक्षों और सदस्यों की नियुक्ति के लिए दक्षता बढ़ाना, स्वतंत्रता, पारदर्शिता और पात्रता संबंधी मानदंडों में एकरूपता सुनिश्चित करना है।
सदन ने विपक्ष के हंगामे के बीच ही चर्चा के बिना विधेयक को पारित कर दिया।
इस विधेयक में राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग के गठन का भी प्रावधान किया गया है।
प्रस्तावित आयोग का मुख्यालय राष्ट्रीय राजधानी में होगा और इसमें एक अध्यक्ष तथा चार सदस्य होंगे। इनमें दो न्यायिक और दो तकनीकी सदस्य होंगे।
उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश या उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश इस प्रस्तावित आयोग के अध्यक्ष पद के लिए पात्र होंगे।
लोकसभा सदस्यों को वितरित किए गए विधेयक के मसौदे में कहा गया है कि उच्चतम न्यायालय ने हाल में ‘न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021’ के कुछ प्रावधानों को इस आधार पर निरस्त कर दिया था कि वे शक्तियों के पृथक्करण और न्यायिक स्वतंत्रता के सिद्धांतों के विपरीत हैं।
उच्चतम न्यायालय ने एक ऐसे राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग के गठन का भी निर्देश दिया था जो स्वतंत्र हो, जिसमें पेशेवर विशेषज्ञता हो तथा विभिन्न न्यायाधिकरणों के अध्यक्षों और सदस्यों के चयन एवं नियुक्ति के लिए पारदर्शी प्रक्रिया और निगरानी व्यवस्था अपनाई जाए।
इस विधेयक के कानून का रूप लेने के बाद 2021 का अधिनियम निरस्त हो जाएगा।
भाषा
वैभव सुभाष
सुभाष