मस्जिदों को लेकर गलत धारणाएं दूर हों, असुविधा हो तो जुमे की नमाज का समय बदला जा सकता है: नजीब जंग

Ads

मस्जिदों को लेकर गलत धारणाएं दूर हों, असुविधा हो तो जुमे की नमाज का समय बदला जा सकता है: नजीब जंग

  •  
  • Publish Date - June 4, 2026 / 11:23 AM IST,
    Updated On - June 4, 2026 / 11:23 AM IST

नयी दिल्ली, चार जून (भाषा) दिल्ली के पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग ने बुधवार को मस्जिदों को लेकर लोगों के मन में बनी गलत धारणाओं को दूर करने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि यदि जुमे की नमाज से दूसरों को असुविधा होती है तो उसके समय में बदलाव किया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि इस्लाम धर्म में ऐसा करने पर कोई रोक नहीं है, फिर इस मुद्दे पर विवाद क्यों होना चाहिए?

जंग ने यह भी कहा कि समाज में ‘‘बढ़ते अविश्वास’’ के माहौल में विभिन्न समुदायों के बीच बेहतर समझ विकसित करने की जरूरत है।

वह यहां इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में आयोजित ‘सिटिजन्स फॉर फ्रेटरनिटी (सीएफएफ) भारत’ के उद्घाटन कार्यक्रम ‘परस्परता सम्मेलन’ को संबोधित कर रहे थे।

सीएफएफ भारत, नागरिकों का एक अनौपचारिक समूह है, जो भाईचारे, संवाद और सामाजिक सौहार्द को बढ़ावा देने के लिए काम करता है। जंग इसके अध्यक्ष हैं।

जामिया मिल्लिया इस्लामिया के पूर्व कुलपति नजीब जंग ने कहा, ‘‘हमें मस्जिदों को लेकर बनी रहस्यमय या गलत धारणाओं को भी दूर करना होगा। लोगों को मस्जिदों में प्रवेश करने से डरना नहीं चाहिए। मस्जिद भी प्रार्थना का एक स्थान है, ठीक वैसे ही जैसे गिरजाघर या मंदिर।’’

उन्होंने कहा, ‘‘हमारे सिख भाईयों ने अपने गुरुद्वारों के द्वार सभी के लिए खोल रखे हैं। फिर मस्जिद में प्रवेश को लेकर हिचकिचाहट क्यों होनी चाहिए?’’

जंग ने कहा, ‘‘इफ्तार के दौरान हम सभी लोगों को रोजा खोलने के लिए क्यों नहीं बुला सकते? इसके लिए सिर्फ दो-चार खजूर ही तो चाहिए।’’

जुमे की नमाज को लेकर होने वाले विवादों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा, ‘‘मैं मानता हूं कि नमाज में केवल लगभग 20 मिनट लगते हैं। लेकिन यदि इससे दूसरों को असुविधा होती है तो नमाज के समय में बदलाव किया जा सकता है। धर्म में ऐसा करने पर कोई रोक नहीं है। फिर इस मुद्दे पर विवाद क्यों होना चाहिए?’’

उन्होंने कहा, ‘‘मुसलमान अक्सर अल्पसंख्यक होने के कारण उत्पन्न असुरक्षा की भावना से प्रतिक्रिया देते हैं। किसी मुसलमान को यह महसूस नहीं करना चाहिए कि भारत हिंदू राष्ट्र बन गया है, केवल इसलिए कि वह किसी के घर में किसी देवी-देवता की तस्वीर देखता है।’’

जंग ने कहा, ‘‘यदि आप पाकिस्तान जाएंगे तो आपको हर जगह काबा की तस्वीरें दिखाई देंगी। किसी देवी-देवता की तस्वीर का अर्थ केवल इतना है कि कोई व्यक्ति ईश्वर की पूजा करता है।’’

उन्होंने दावा किया कि भारत ‘‘भय और नफरत के संकट’’ का सामना कर रहा है। उन्होंने विश्वास बहाली के लिए अधिक संवाद और सामाजिक सहभागिता का आह्वान किया।

उन्होंने कहा, ‘‘आज हमारे लिए भगवा और हरा रंग अलग-अलग धर्मों के प्रतीक बन गए हैं। मुझे नहीं लगता कि राष्ट्र निर्माण के समय यही हमारी परिकल्पना थी।’’

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी ने भाईचारे के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि संविधान के इस मूल्य को स्वतंत्रता और समानता की तुलना में बहुत कम महत्व मिला है।

उन्होंने कहा, ‘‘हम लगातार संविधान की बात करते हैं। हम मौलिक अधिकारों, समानता और स्वतंत्रता की चर्चा करते हैं। लेकिन उसी संवैधानिक अवधारणा में एक शब्द ऐसा भी है जिस पर हम बहुत कम चर्चा करते हैं -भाईचारा । यह लोगों के सामूहिक अधिकार का प्रतीक है, जिसके तहत वे सौहार्द और भाईचारे के साथ जीवन व्यतीत करते हैं।’’

कुरैशी ने बताया कि हाल ही में एक प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत से मुलाकात कर भारत में अल्पसंख्यकों के भविष्य पर उनके विचार जाने थे।

उन्होंने कहा, ‘‘कुछ दिन पहले हममें से कुछ लोग मोहन भागवत जी से मिले थे। हमने उनसे सीधा सवाल पूछा कि वर्तमान परिस्थितियों में भारत में मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों का भविष्य क्या है? हिंदू राष्ट्र में उनका भविष्य कैसा होगा?’’

कुरैशी के अनुसार, ‘‘भागवत जी ने जवाब दिया कि वह हिंदू-मुस्लिम एकता के बिना हिंदू राष्ट्र की कल्पना भी नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि भारत ऐसी एकता के बिना आगे नहीं बढ़ सकता। उनकी इस बात ने हमें गहराई से प्रेरित किया।’’

भारतीयों द्वारा पासपोर्ट छोड़ने या दूसरे देशों की नागरिकता लेने संबंधी खबरों का जिक्र करते हुए कुरैशी ने कहा कि ऐसा करने वाले लोग गरीब या उत्पीड़ित अल्पसंख्यक नहीं, बल्कि सफल हिंदू कारोबारी हैं।

कुरैशी ने बढ़ते राजनीतिक ध्रुवीकरण पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा, ‘‘जमीनी हकीकत यह है कि ध्रुवीकरण बढ़ रहा है। मुझे व्यक्तिगत रूप से लगता है कि राजनीति ने एक नया फार्मूला खोज लिया है : ध्रुवीकरण करो और चुनाव जीत जाओ।’’

इस दौरान वरिष्ठ आरएसएस पदाधिकारी राम लाल ने मोहन भागवत के साथ हुई चर्चाओं का उल्लेख करते हुए कहा, ‘‘जब हिंदू-मुस्लिम एकता का मुद्दा उठा तो भागवत जी ने कहा कि एकता की आवश्यकता वहां होती है जहां अलग-अलग इकाइयां हों। हम हिंदुओं और मुसलमानों को अलग नहीं मानते, बल्कि एक ही समाज का हिस्सा मानते हैं।’’

उन्होंने कहा कि भागवत बार-बार कहते रहे हैं कि यदि भारत को अधिक मजबूत और महान बनना है तो सभी समुदायों को उसमें योगदान देना होगा।

राम लाल ने धार्मिक आयोजनों में सहिष्णुता और परस्पर संवेदनशीलता पर भी जोर दिया।

उन्होंने कहा, ‘‘रमजान में रोजा रखने का उद्देश्य आत्म-अनुशासन और आत्म-शुद्धि है, संघर्ष पैदा करना नहीं।’’

उन्होंने कहा, ‘‘इसी प्रकार जब मैं दिवाली या होली मनाता हूं तो मुझे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि मेरे उत्सव से दूसरों को अनावश्यक परेशानी न हो। यदि मेरे पटाखों से किसी को दिक्कत होती है तो मुझे यह सोचना चाहिए कि उनका उपयोग कैसे और कहां करूं। यदि होली के रंगों से किसी को परेशानी होती है तो मुझे संयम बरतना चाहिए।’’

राम लाल ने कहा, ‘‘साथ ही यदि थोड़ी-सी रंग की छींट किसी पर अनजाने में पड़ जाए तो समाज को भी सहिष्णुता सीखनी चाहिए। संवेदनशीलता और सहिष्णुता दोनों ही आवश्यक हैं।’’

भाषा गोला मनीषा

मनीषा