नयी दिल्ली, 29 सितंबर (भाषा) राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की नौवीं कक्षा की सामाजिक विज्ञान की नई पाठ्यपुस्तक में लिखा है कि इतिहास में सिख गुरुओं के खिलाफ मुगलों जैसी क्रूरता की कम ही मिसालें मिलती हैं और इस क्रूरता की जड़ें ‘‘कट्टर धार्मिक तथा भेदभावपूर्ण प्रथाओं में’’ समाहित थीं।
‘अंडरस्टैंडिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड-पार्ट 2’ नामक यह पुस्तक नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के छह महीने बाद मंगलवार को जारी की गई। इस पाठ्यपुस्तक का पहला भाग जून में जारी किया गया था।
पुस्तक के ‘रेजिस्टेंस एंड रेजिलिएंस’ नामक अध्याय में सातवीं शताब्दी के बाद भारतीय उपमहाद्वीप पर हुए लगातार आक्रमणों का उल्लेख किया गया है। इसमें युद्ध के दौरान धार्मिक परंपराओं का भी वर्णन किया गया है।
पाठ्यपुस्तक में लिखा है, ‘‘सिख गुरुओं, विशेष रूप से गुरु अर्जन देव, गुरु तेग बहादुर और दसवें गुरु गुरु गोबिंद सिंह के खिलाफ मुगल शासन की क्रूरता की इतिहास में कम ही मिसालें मिलती हैं। धर्म की रक्षा के लिए गुरुओं के साहस और बलिदान सिख धर्म की एक प्रमुख पहचान बन गए।’’
पाठ्यपुस्तकों में लिखा है, ‘‘राजनीतिक कारणों से परे, ये चीजें मुगलों की कठोर धार्मिक और भेदभावपूर्ण प्रथाओं में गहराई से निहित थी। सिख गुरुओं के बढ़ते सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभाव के कारण मुगल शासन ने 17वीं शताब्दी की शुरुआत से ही उनके मामलों में हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया था।’’
अध्याय में लिखा है कि गुरुओं की शहादत ने सिख समुदाय के इस विश्वास को और मजबूत किया कि उत्पीड़न का सामना ‘‘दृढ़ प्रतिरोध और मजबूती’’ के साथ किया जाना चाहिए।
पाठ्यपुस्तक में बताया गया कि मुगल सम्राट जहांगीर ने अपने बेटे और विद्रोही खुसरो मिर्जा का कथित समर्थन करने के आरोप में गुरु अर्जन देव को मृत्युदंड देने का आदेश दिया था।
इसे सिख इतिहास में ‘‘महत्वपूर्ण मोड़’’ बताते हुए लिखा गया कि इसके बाद सिख समुदाय के संगठनात्मक और राजनीतिक दृष्टिकोण में बदलाव आया।
पुस्तक में जहांगीर द्वारा गुरु हरगोबिंद को ग्वालियर किले में नजरबंद किए जाने का भी उल्लेख है।
पुस्तक में लिखा है कि बड़ी संख्या में सिख किले के बाहर से गुरु हरगोबिंद के प्रति सम्मान प्रकट करने पहुंचते थे।
गुरु तेग बहादुर के संबंध में पुस्तक में लिखा गया है, ‘‘1675 में औरंगजेब ने नौवें सिख गुरु गुरु तेग बहादुर को मृत्युदंड देने का आदेश दिया। उनकी शहादत भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई।’’
पाठ्यपुस्तक में इन शहादतों को संगठित प्रतिरोध के उदय से जोड़ते हुए बताया गया है कि इस तरह के उत्पीड़न और राजनीतिक दबाव का मुकाबला ‘‘सामूहिक संगठन और जरूरत पड़ने पर सशस्त्र प्रतिरोध के जरिए ही किया जा सकता था।’’
अध्याय में गुरु हरगोबिंद द्वारा अकाल तख्त की स्थापना का भी उल्लेख किया गया है।
भाषा जितेंद्र राजकुमार
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