नयी दिल्ली, 20 अप्रैल (भाषा) तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता डेरेक ओब्रायन ने सोमवार को आज के भारत की तुलना 1930 के दशक के जर्मनी के नाजी युग से करते हुए कहा कि मौजूदा समय में यहां भी कुछ वैसी घटनाएं हो रही हैं जो उस दौर में जर्मनी में होती थीं।
राज्यसभा में तृणमूल के नेता ने एक ब्लॉग में दावा किया कि 1930 के दशक की जर्मन नीतियां और भारत में हाल के घटनाक्रमों में समानता है।
उन्होंने उस समय जर्मनी में अंतर-धार्मिक संबंधों को प्रतिबंधित करने वाले कानूनों का हवाला देते हुए वर्तमान समय में भारत के कुछ राज्यों में धर्मांतरण विरोधी कानूनों विशेष रूप से विवाह संबंधी कानूनों का उल्लेख किया।
ओब्रायन ने लिखा, ‘‘12 राज्यों ने किसी भी प्रकार के धर्मांतरण के खिलाफ कानून बनाए हैं। हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात और हरियाणा में पारित कानून विशेष रूप से विवाह के उद्देश्य से धर्मांतरण को अपराध मानते हैं और धर्मांतरण के लिए किए गए किसी भी विवाह को अमान्य घोषित करते हैं। किसी व्यक्ति को अपना धर्म बदलने की अनुमति देने से पहले उन्हें राज्य की मंजूरी की भी आवश्यकता होती है।’
उन्होंने जर्मनी में वंश पर आधारित 1935 के नागरिकता ढांचे का जिक्र करते हुए इसे भारत के नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (सीएए) के साथ जोड़ा।
सीएए पड़ोसी देशों से निकाले गए धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों को भारत की नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान करता है।
ओब्रायन ने उत्तर प्रदेश की एक घटना का उल्लेख किया जहां कांवड़ यात्रा मार्ग पर भोजनालयों को अपने मालिकों के नाम प्रदर्शित करने के लिए कहा गया था।
उन्होंने इसकी तुलना नाजी पार्टी द्वारा यहूदी व्यवसायों के बहिष्कार और उन्हें चिह्नित करने के लिए उन प्रतिष्ठानों के बाहर भित्तिचित्रों की व्यवस्था से की।
टीएमसी नेता ने 1930 के दशक में जर्मनी में किताबें जलाने की घटना का भी उल्लेख किया और इसकी तुलना राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) द्वारा स्कूली पाठ्यपुस्तकों में संशोधन और हाल ही में मणिपुर में लगभग 249 गिरजाघरों को कथित तौर पर जलाए जाने से की।
ओब्रायन का कहना है कि उन्होंने यह पोस्ट प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को समर्पित किया है।
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