एनसीईआरटी ने आठवीं कक्षा की पुस्तक को वेबसाइट से हटाया; न्यायालय में बृहस्पतिवार को सुनवाई

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एनसीईआरटी ने आठवीं कक्षा की पुस्तक को वेबसाइट से हटाया; न्यायालय में बृहस्पतिवार को सुनवाई

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  • Publish Date - February 25, 2026 / 10:05 PM IST,
    Updated On - February 25, 2026 / 10:05 PM IST

नयी दिल्ली, 25 फरवरी (भाषा) प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की आठवीं कक्षा के सामाजिक विज्ञान पाठ्यक्रम में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर अध्याय होने को लेकर बुधवार को कड़ी आपत्ति जताई, जिसके बाद एनसीईआरटी ने विवादित पाठ्यपुस्तक को अपनी वेबसाइट से हटा दिया।

वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक सिंघवी द्वारा मामले का, तत्काल विचार करने के लिए उल्लेख किये जाने के बाद, प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत तथा न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और विपुल एम पंचोली की पीठ ने एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका के बारे में ‘‘आपत्तिजनक’’ सामग्री का स्वतः संज्ञान लिया।

पीठ स्वत: संज्ञान वाले इस मामले पर बृहस्पतिवार को सुनवाई करने वाली है।

एनसीईआरटी की आठवीं कक्षा की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में कहा गया है कि भ्रष्टाचार, बड़ी संख्या में लंबित मामले और काफी संख्या में न्यायाधीशों की कमी न्यायिक प्रणाली के समक्ष पेश आने वाली चुनौतियों में शामिल हैं।

न्यायालय ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि वह ‘‘धरती पर किसी को भी’’ न्यायपालिका की सत्यनिष्ठा को धूमिल करने की अनुमति नहीं देगा। इसके बाद, एनसीईआरटी ने पाठ्यपुस्तक को अपनी वेबसाइट से हटा दिया।

सूत्रों का कहना है कि सरकार पाठ्यक्रम में विवादास्पद संदर्भों से काफी नाराज है।

उन्होंने बताया कि एनसीईआरटी छापी जा चुकी पुस्तक से विवादित अंश को हटाने पर भी विचार कर रही है।

हालांकि, राष्ट्रीय राजधानी में कई स्कूलों ने कहा है कि उन्हें इस बारे में अभी कोई निर्देश नहीं दिया गया है कि पुस्तक के संबद्ध हिस्से को छात्रों को पढ़ाया जाए या नहीं।

इस बीच, यह जानकारी मिली है कि एनसीईआरटी ने अध्याय से संबंधित विषय विशेषज्ञों और इसे मंजूरी देने वाले अधिकारियों की अनुशंसा की समीक्षा के लिए एक आंतरिक बैठक बुलाई है।

एनसीईआरटी के अध्यक्ष दिनेश प्रसाद सकलानी ने इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया के लिए किये गए फोन और भेजे गए संदेशों का जवाब नहीं दिया। परिषद के एक अन्य वरिष्ठ अधिकारी ने यह कहते हुए टिप्पणी करने से इनकार कर दिया कि मामला अभी न्यायालय में विचाराधीन है।

सरकारी सूत्रों ने कहा कि हालांकि, एनसीईआरटी एक स्वायत्त संस्था है, लेकिन अध्याय जोड़ने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों को सोच-समझकर निर्णय लेना चाहिए था। उन्होंने कहा कि यदि भ्रष्टाचार के मुद्दे को पाठ्यपुस्तक में शामिल करना ही था, तो इसे कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका – तीनों से संबंधित होना चाहिए था।

सिब्बल ने कहा, ‘‘इस संस्था (न्यायपालिका) के सदस्य होने के नाते, हमें यह जानकर बहुत दुख हुआ है कि कक्षा आठ के बच्चों को न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के बारे में पढ़ाया जा रहा है। यह एनसीईआरटी की पुस्तक का हिस्सा है। संस्था से हमारा गहरा जुड़ाव है… यह (अध्याय) पूरी तरह से निंदनीय है। हमारे पास पुस्तक की प्रतियां हैं।’’

प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘मैं आप सभी को आश्वस्त कर सकता हूं कि मुझे इसकी पूरी जानकारी है।’’ उन्होंने कहा कि उन्हें कई फोन और संदेश मिले हैं और कई उच्च न्यायालय के न्यायाधीश ‘‘चिंतित’’ हैं।

जब सिब्बल ने उम्मीद जतायी कि पीठ स्वतः संज्ञान लेगी, तो प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘एक दिन इंतजार कीजिए। यह निश्चित रूप से पूरी संस्था के लिए चिंता का विषय है। बार और पीठ दोनों परेशान हैं। व्यवस्था से जुड़े हर हितधारक वास्तव में परेशान हैं। मुझे बहुत सारे फोन और संदेश मिल रहे हैं। उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश भी परेशान हैं।’’

प्रधान न्यायाधीश ने सिब्बल को बताया कि उन्होंने इस मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए पहले ही आदेश पारित कर दिया है। नाराज दिख रहे सीजेआई ने कहा, ‘‘मैं धरती पर किसी को भी संस्था की गरिमा को धूमिल करने और संस्था को बदनाम करने नहीं दूंगा। किसी भी कीमत पर मैं इसे बर्दाश्त नहीं करूंगा। कोई कितना भी बड़े पद या प्रभाव वाला क्यों ना हो, कानून अपना काम करेगा। मुझे पता है इससे कैसे निपटना है।’’

सिंघवी ने एनसीईआरटी द्वारा अपनाए गए चयनात्मक दृष्टिकोण का मुद्दा उठाया और कहा कि एनसीईआरटी ने यह मान लिया कि ‘और कहीं भी भ्रष्टाचार नहीं है। नौकरशाही, राजनीति, सार्वजनिक जीवन और अन्य संस्थानों में भ्रष्टाचार का कोई उल्लेख नहीं है।’

प्रधान न्यायाधीश ने कहा और इस मुद्दे को उठाने के लिए वकीलों को धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा, ‘‘ऐसा लगता है कि यह एक बहुत ही सोची-समझी और गहरी साजिश के तहत उठाया गया कदम है… हम इस बारे में और कुछ नहीं कहना चाहते… मुझे इसकी जानकारी है और मैंने अपना कर्तव्य निभाया है।’’

न्यायमूर्ति बागची ने संविधान के मूल ढांचा सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि ‘‘पाठ्यपुस्तक की सामग्री में मूल ढांचा के प्रति संवैधानिक सत्यनिष्ठा का अभाव है।’’

पुस्तक में उल्लेख किया गया है कि उच्चतम न्यायालय में लगभग 81,000, उच्च न्यायालयों में 62.40 लाख और जिला एवं अधीनस्थ न्यायालयों में 4.70 करोड़ मामले लंबित हैं।

यह न्यायपालिका के आंतरिक जवाबदेही तंत्र को रेखांकित करती है और केंद्रीकृत लोक शिकायत निवारण एवं निगरानी प्रणाली के माध्यम से शिकायतें प्राप्त करने की स्थापित प्रक्रिया का उल्लेख करती है।

पुस्तक के अनुसार, 2017 और 2021 के बीच इस प्रणाली के माध्यम से 1,600 से अधिक शिकायतें प्राप्त हुईं।

पाठ्यपुस्तक में पूर्व प्रधान न्यायाधीश बी आर गवई का भी उल्लेख है, जिन्होंने जुलाई 2025 में कहा था कि न्यायपालिका के भीतर भ्रष्टाचार और कदाचार के मामलों का लोगों के विश्वास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है।

सूत्रों ने यह भी बताया कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को लेकर पूर्व प्रधान न्यायाधीश गवई के बयान को संदर्भ से बाहर लिया गया और माना जा रहा है कि वह इससे नाराज हैं।

इस महीने की शुरुआत में, कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने लोकसभा को बताया था कि 2016 से 2025 के बीच मौजूदा न्यायाधीशों के खिलाफ 8,639 शिकायतें प्राप्त हुई हैं। इनमें से सबसे अधिक (1,170) शिकायतें 2024 में प्रधान न्यायाधीश के कार्यालय को (तत्कालीन) मौजूदा न्यायाधीशों के खिलाफ प्राप्त हुईं।

भाषा सुभाष रंजन

रंजन