मणिपुर जातीय हिंसा मामले की सुनवाई में तेजी लाने की जरूरत : उच्चतम न्यायालय

मणिपुर जातीय हिंसा मामले की सुनवाई में तेजी लाने की जरूरत : उच्चतम न्यायालय

मणिपुर जातीय हिंसा मामले की सुनवाई में तेजी लाने की जरूरत : उच्चतम न्यायालय
Modified Date: May 27, 2026 / 03:58 pm IST
Published Date: May 27, 2026 3:58 pm IST

नयी दिल्ली, 27 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि 2023 के मणिपुर जातीय हिंसा मामले में चल रहे मुकदमे में तेजी लाने की जरूरत है और अधिकारियों से वस्तु स्थिति रिपोर्ट मांगी।

मणिपुर में 3 मई 2025 को पहाड़ी जिलों में आयोजित ‘आदिवासी एकजुटता मार्च’ के बाद जातीय हिंसा हुई थी। यह विरोध-प्रदर्शन मेइती समुदाय को अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा देने की मांग के खिलाफ हुआ था। हिंसा में 260 से अधिक लोगों की जान चली गई और हजारों लोग विस्थापित हुए।

बुधवार को प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने गौर किया कि विशेष जांच दल (एसआईटी) की रिपोर्ट के अनुसार, 400 से अधिक आरोपियों के खिलाफ 207 मामलों में आरोपपत्र दाखिल किए जा चुके हैं।

पीठ गुवाहाटी उच्च न्यायालय द्वारा दो आरोपियों, अरुण खुंडोंगबम और नामिरकपम किरण मेइती को जमानत दिए जाने के खिलाफ सीबीआई की याचिका पर सुनवाई कर रही है। उन पर पीड़िताओं के साथ सामूहिक बलात्कार करने और उन्हें निर्वस्त्र कर घुमाने का आरोप है।

न्यायालय ने कहा, ‘‘हमारा मानना ​​है कि मुकदमे की कार्यवाही में तेजी लाने की आवश्यकता है। हमने सीबीआई और अन्य एजेंसियों से पीड़ितों की सहायता के लिए मणिपुरी भाषा में पारंगत कानूनी सलाहकारों को उपलब्ध कराने का अनुरोध किया है…। मौजूदा मुकदमे की वस्तु स्थिति अगली सुनवाई में दर्ज की जानी चाहिए।’’

सुनवाई की शुरुआत में पीठ ने कहा कि यह मामला पीड़ितों के परिवारों को कानूनी सहायता उपलब्ध कराने के मुद्दे पर सुनवाई के लिए है और वह अन्य मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगी।

सीबीआई की रिपोर्ट का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि 20 मामलों में आरोपपत्र दाखिल किए जा चुके हैं और 16 मामलों में सुनवाई शुरू हो चुकी है जबकि एसआईटी की वस्तु स्थिति रिपोर्ट के अनुसार, 400 से अधिक आरोपियों के खिलाफ 207 मामलों में आरोपपत्र दाखिल किए गए हैं।

पीठ ने यह भी कहा कि पूर्व आईपीएस अधिकारी दत्तात्रेय पडसालगीकर द्वारा दाखिल रिपोर्ट के अनुसार, इस वर्ष 7 और 18 अप्रैल को राज्य में हिंसा की कुछ घटनाएं होने के कारण कानून व्यवस्था की स्थिति ‘‘नाजुक’’ हो गई थी।

पीठ ने यह भी कहा कि पीड़ितों का व्यवस्था पर भरोसा अत्यंत महत्वपूर्ण है और उनके साथ ‘‘विश्वास बढ़ाने के उपाय’’ आवश्यक हैं।

गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने 8 सितंबर 2025 को दोनों आरोपियों को इस आधार पर जमानत दे दी कि उन पर आरोप तय होने से पहले, वे दो साल से हिरासत में थे, और इसे ‘‘अनुचित लंबी कैद’’ करार दिया।

सीबीआई ने यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों के चलते जमानत रद्द करने का अनुरोध किया।

बुधवार को सुनवाई के दौरान, पीड़ितों में से कुछ की ओर से पेश हुए अधिवक्ता निज़ाम पाशा ने कहा कि जिस अदालत ने 9 मई 2025 को अपराधों की जघन्य प्रकृति का जिक्र किया था, उसी ने 8 सितंबर को देरी के आधार पर जमानत दे दी।

पीठ ने कहा, ‘‘चूंकि यह स्वतंत्रता का मामला है, इसलिए जमानत रद्द करने के लिए एक ठोस आधार की आवश्यकता है। हमारी मुख्य चिंता सच्चाई को सामने लाना है और इसके लिए जो भी उपाय आवश्यक होगा, हम उस पर विचार करेंगे…।’’

भाषा सुभाष नरेश

नरेश


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