जोधपुर, 13 अप्रैल (भाषा) राजस्थान उच्च न्यायालय ने स्नातकोत्तर चिकित्सा के पाठ्यक्रम में प्रवेश में आरक्षण के दायरे पर एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि अन्य राज्यों के अभ्यर्थी राजस्थान में आरक्षित श्रेणी की सीटों पर दावा नहीं कर सकते हैं।
यह निर्णय राजस्थान के निजी चिकित्सा एवं दंत महाविद्यालयों के संघ द्वारा दायर एक याचिका पर आया है। याचिका में राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा-परास्नातक (नीट-पीजी) काउंसलिंग बोर्ड के 18 फरवरी, 2026 के प्रस्ताव को चुनौती दी गई थी।
याचिकाकर्ता ने निर्देश देने का अनुरोध किया था कि गैर-निवासी अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के अभ्यर्थियों को आरक्षण का लाभ (जिनमें कम प्रतिशत भी शामिल है) प्राप्त करने और राजस्थान में आरक्षित सीटों के लिए काउंसलिंग में भाग लेने की अनुमति दी जाए।
याचिका को खारिज करते हुए न्यायमूर्ति संजीत पुरोहित ने कहा कि संवैधानिक प्रणाली में स्पष्ट रूप से स्थानीय सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के आधार पर राज्यवार आरक्षित श्रेणियों की पहचान का प्रावधान है।
अदालत ने कहा कि इस तरह के लाभों को राज्य की सीमाओं के पार विस्तारित करना इस ढांचे के विपरीत होगा। अदालत ने फैसला सुनाया कि राज्य की नीति आरक्षण को नियंत्रित करने वाले संवैधानिक ढांचे के अनुरूप है और इससे कोई अवैधता या भेदभाव उत्पन्न नहीं होता है।
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि नीट-पीजी के अर्हता प्रतिशत को कम करने के उद्देश्य (बड़ी संख्या में रिक्त सीटों को भरना) को राज्य के बाहर के आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवारों को लाभ उठाने से बाहर करके विफल कर दिया गया है।
दूसरी ओर, राज्य ने अपने पक्ष का बचाव करते हुए कहा कि आरक्षण नीतियां स्वाभाविक रूप से राज्य-विशिष्ट होती हैं और केवल राजस्थान की अधिसूचित श्रेणियों के अंतर्गत मान्य अभ्यर्थियों पर ही लागू होती हैं।
राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि गैर-निवासी अभ्यर्थियों को पूर्णतः भाग लेने से नहीं रोका गया है, बल्कि काउंसलिंग दिशानिर्देशों के अनुसार उन्हें अनारक्षित श्रेणी में शामिल किया गया है।
उच्च न्यायालय ने 100 प्रतिशत अधिवासी आरक्षण से जुड़े विवाद को खारिज करते हुए कहा कि यह नीति केवल राज्य के पात्र अभ्यर्थियों को ही आरक्षण का लाभ देती है, जबकि अन्य को सामान्य श्रेणी में प्रतिस्पर्धा करने की अनुमति देती है।
भाषा संतोष नरेश
नरेश