देहरादून, 27 अगस्त (भाषा) नेपाल में भीषण बाढ़ से हुई तबाही ने उत्तराखंड में पिछले कुछ वर्षो में ऋषिगंगा और धराली में आई आपदाओं की भयावहें यादें ताजा कर दी हैं।
फरवरी 2021 में चमोली जिले में ऋषिगंगा आपदा और अगस्त 2025 को उत्तरकाशी जिले की धराली आपदाओं में न केवल जानमाल की जबरदस्त हानि हुई बल्कि हजारों लोगों की जिंदगी को भी प्रभावित किया जिससे वे आज तक नहीं उबर पाए हैं।
सात फरवरी 2021 को बाढ़ से हुए विनाश का मंजर नजदीक से देखने वाले लोगों को याद है कि उस दिन नेपाल की तरह ही रेणी-तपोवन के इलाके में भी आसमान साफ था और धूप खिली थी लेकिन अचानक ऋषिगंगा नदी के उपरी इलाके में रौठीगाड़ से हिमनद के साथ आए मिट्टी, पत्थर और पानी ने उसके प्रवाह को कुछ देर के लिए रोक दिया।
इसके बाद वहां से बहा मलबा और पानी भीषण बाढ़ के रूप में निचली घाटी के लिए ‘‘काल’’ बन गया।
आसपास के इलाकों को चपेट में लेते हुए यह बाढ़ पहले ऋषिगंगा के मुहाने पर बनी जल विद्युत परियोजना को अपने साथ बहाकर ले गयी और उसके बाद धौलीगंगा नदी के साथ मिलकर तपोवन में कहर बरपाते हुए एनटीपीसी की पन बिजली परियोजना के एक बड़े हिस्से को मिनटों में तबाह कर गयी।
हादसे के दिन तपोवन में मौजूद सामाजिक कार्यकर्ता ओ.पी. डोभाल ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया कि पांच साल बीतने के बावजूद उस आपदा के जख्म अब तक नहीं भरे हैं और उस सुबह को याद करके लोग अब भी सिहर उठते हैं।
इस आपदा में 200 से अधिक स्थानीय लोग और श्रमिक मारे गए तथा लोगों के मकानों और खेतों के साथ ही सार्वजनिक संपत्ति को भी भारी नुक़सान हुआ था।
बाढ़ में तपोवन के सामने भंग्यूल गांव समेत कई गांवों के आवागमन के पुल और रास्ते बह गए थे और पांच साल बाद भी स्थिति बदली नहीं है।
विष्णुप्रयाग-जोशीमठ के पैदल रास्ते पर बना पुल आज तक नहीं बन पाया जबकि विष्णुप्रयाग से मारवाणी के बीच बाढ़ से नदी तट पर हुए कटाव से जोशीमठ नगर में भू-धंसाव बढ़ गया।
पिछले साल अगस्त में धराली में आयी आपदा की यादें भी धुंधली नहीं पड़ी हैं। आज भी हर सुबह चक्रधर सेमवाल मुखबा गांव में अपने घर के बाहर बैठकर भागीरथी नदी के उस पार स्थित धराली को ताकते रहते हैं। आज वहां सब कुछ शांत दिखाई देता है जहां नदी अपनी सामान्य रफ्तार से बह रही है और तीर्थयात्री गंगोत्री की ओर जा रहे हैं।
हालांकि, 68 वर्षीय सेवानिवृत्त तहसीलदार सेमवाल के लिए पहाड़ों की यह शांति उस भयावह मंजर की यादों को कभी मिटा नहीं सकती, जो ठीक एक साल पहले उनकी आंखों के सामने घटा था।
पांच अगस्त, 2025 को सेमवाल इसी जगह बैठे थे, जब अचानक उनकी नजर बरसाती नदी खीरगाड़ पर पड़ी। भागीरथी की इस सहायक नदी से भारी मात्रा में पानी, विशाल पत्थर और मलबा तेजी से नीचे की ओर आता दिखाई दिया।
कुछ ही क्षणों में मलबे से उफनती जलधारा ने धराली को अपनी आगोश में ले लिया और उत्तराखंड के सबसे खूबसूरत हिमालयी कस्बों में शुमार धराली देखते ही देखते मलबे के पहाड़ में तब्दील हो गया।
उस दिन को याद करते हुए सेमवाल ने कहा, ‘‘मुझे समझ आ गया था कि कुछ बहुत भयानक होने वाला है, लेकिन तबाही इतनी ज्यादा होगी, मैंने कभी नहीं सोचा था।’’
सेमवाल ने कहा कि बाढ़ का वेग बढ़ता जा रहा था तो उन्होंने सीटी बजाकर और चिल्लाते हुए नदी के पार लोगों को वहां से जल्दी भागने और ऊपर के स्थानों में चढ़ने की चेतावनी देना शुरू कर दिया।
इसी दौरान उन्होंने अपने मोबाइल फोन से इस भयावह दृश्य को रिकॉर्ड भी किया और मलबे और पत्थरों से भरी बाढ़ के धराली की ओर बढ़ने का वह वीडियो देखते ही देखते देश-दुनिया में फैल गया।
सेमवाल ने कहा, ‘‘मैं आज भी उसी जगह बैठा हूं, जहां एक साल पहले बैठा था। मैंने जो देखा, उसे बयान करने के लिए आज भी मेरे पास शब्द नहीं हैं। वह मेरी जिंदगी का सबसे खौफनाक मंजर था।’’
आपदा ने धराली की पहचान से जुड़ी लगभग हर चीज को निगल लिया। होटल, होमस्टे, मकान, दुकानें, सेब के बाग और लोगों की आजीविका सहित सब कुछ करीब 50 से 60 फीट मलबे के नीचे दब गया।
कस्बे की आध्यात्मिक विरासत का प्रतीक पवित्र कल्प केदार मंदिर भी मलबे में दब गया।
प्रसिद्ध वैज्ञानिक पीयूष रौतेला ने कहा, ‘‘वैज्ञानिक दृष्टिकोण, प्रभावी नीतियों और पारंपरिक ज्ञान को एकीकृत करने वाली सक्रिय और दूरदर्शी कार्ययोजना लागू करके हम राज्य को निरंतर बनी रहने वाली असुरक्षा की स्थिति से निकालकर वास्तविक और स्थायी तौर पर आपदा से निपटने वाले भविष्य की ओर ले जा सकते हैं।’’
प्रख्यात पर्यावरणविद् एवं पद्मभूषण चंडी प्रसाद भट्ट (93) ने भी नेपाल बाढ़ से सबक लेते हुए हिमालय के संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयास की जरूरत जतायी।
उन्होंने आज से दो दशक पहले राष्ट्रीय स्तर पर हिमालय के संरक्षण और विकास के लिए एस स्वामीनाथन समिति द्वारा सुझाए गए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाले हिमालयी विकास आयोग के गठन की भी वकालत की।
भट्ट ने कहा कि हिमालय में होने वाली गड़बड़ियों का असर पूरे देश पर पड़ता है क्योंकि हिमालय से निकलने वाली नदियां न केवल पर्वतीय क्षेत्रों अपितु पूरे देश को जीवन प्रदान करती हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘हिमालय दुनिया की सबसे संवेदनशील पर्वत मालाओं में से एक है। मौसमी बदलाव के कारण उच्च हिमालय की संवेदनशीलता और बढ़ गयी है। ऐसे में उसका संरक्षण हमारी प्राथमिकता होना चाहिए।’’
भट्ट ने हिमालय से जुड़े देशों के राष्ट्राध्यक्षों से भी एक मंच पर आकर इस तरह की घटनाओं से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए सामूहिक प्रयास करने तथा एक संयुक्त मंच विकसित करने की पहल करने का आह्वान किया।
पर्यावरणविद् ने कहा कि चीन, नेपाल, भूटान और भारत को इस प्रकार की आपदाओं की रोकथाम के लिए एक मंच बनाना चाहिए।
भाषा दीप्ति शफीक
शफीक