सामूहिक दुष्कर्म पीड़िता को तीन लाख रुपये मुआवजा देने का एनएचआरसी का आदेश बरकरार

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सामूहिक दुष्कर्म पीड़िता को तीन लाख रुपये मुआवजा देने का एनएचआरसी का आदेश बरकरार

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  • Publish Date - August 4, 2026 / 09:08 PM IST,
    Updated On - August 4, 2026 / 09:08 PM IST

नयी दिल्ली, चार अगस्त (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने वर्ष 2012 में ट्रेन के भीतर सामूहिक दुष्कर्म की शिकार हुई एक महिला यात्री को तीन लाख रुपये का मुआवजा देने के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के निर्देश को बरकरार रखा है।

न्यायमूर्ति अमित बंसल ने रेल मंत्रालय की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें एनएचआरसी के फैसले को चुनौती दी गई थी। उन्होंने कहा कि रेल प्रशासन पर पीड़िता को ‘‘सुरक्षित वातावरण’’ उपलब्ध कराने का दायित्व था।

अदालत ने कहा कि सामूहिक दुष्कर्म ‘‘हिंसक हमले’’ की श्रेणी में आता है और रेलवे अधिनियम के तहत इसे ‘‘अवांछित घटना’’ माना जाएगा, इसलिए रेलवे मुआवजा देने के लिए उत्तरदायी है।

न्यायमूर्ति बंसल ने कहा कि मुआवजा देने संबंधी एनएचआरसी का निर्देश न तो मनमाना है और न ही स्पष्ट रूप से अवैध। उन्होंने कहा कि आयोग ने ‘‘मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन की शिकार पीड़िता को तत्काल आर्थिक राहत देने की सिफारिश कर अपने अधिकार क्षेत्र का उचित इस्तेमाल किया है।’’

अदालत ने 29 जुलाई को पारित एक आदेश में कहा, ‘‘तथ्य यह है कि पीड़िता एक वास्तविक यात्री थी, जिसने यात्रा के लिए वैध टिकट खरीदा था और घटना के समय ट्रेन में यात्रा कर रही थी। रेलवे पर ट्रेन के डिब्बे के भीतर सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराने का दायित्व था।’’

अदालत ने कहा, ‘‘चूंकि यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना ट्रेन के एक डिब्बे के भीतर हुई, इसलिए यह रेलवे अधिनियम की धारा 123(ग) के तहत ‘अवांछित घटना’ की परिभाषा में आएगी और रेलवे अधिनियम की धारा 124ए के तहत रेलवे मुआवजा देने के लिए उत्तरदायी होगा।’’

उसने कहा, ‘‘याचिका में कोई दम नहीं है, इसलिए इसे खारिज किया जाता है।’’

उच्च न्यायालय ने अपने रजिस्ट्रार को निर्देश दिया कि मामले के लंबित रहने के दौरान रेलवे की ओर से जमा कराई गई मुआवजा राशि, उस पर अर्जित ब्याज सहित पीड़िता को जारी की जाए।

अगस्त 2012 में बिहार के लखीसराय रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म संख्या-पांच पर खड़ी एक यात्री ट्रेन के डिब्बे में महिला के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया था।

पीड़िता के पिता की शिकायत के बाद एनएचआरसी ने अप्रैल 2014 में कहा था कि रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष पीड़िता को तीन लाख रुपये का मुआवजा देने के लिए उत्तरदायी हैं।

इसके बाद रेलवे ने आयोग के समक्ष यह कहते हुए पुनर्विचार का अनुरोध किया था कि मुआवजे का निर्धारण केवल रेलवे दावा अधिकरण कर सकता है। हालांकि, एनएचआरसी ने यह अनुरोध खारिज करते हुए मुआवजा देने का निर्देश बरकरार रखा।

उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि रेलवे अधिनियम की धारा 124ए के अनुसार रेलवे ‘‘अवांछित घटना’’ के लिए मुआवजा देने का उत्तरदायी है, भले ही वह घटना रेलवे की किसी गलती, लापरवाही या चूक के कारण न हुई हो।

अदालत ने कहा कि इसलिए यदि सामूहिक दुष्कर्म निजी व्यक्तियों द्वारा किया गया हो और उनका रेलवे से कोई संबंध न हो, तब भी इससे मुआवजा देने की रेलवे की जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती।

उच्च न्यायालय ने रेखांकित किया कि भले ही एनएचआरसी के निर्देश ‘‘अनुशंसात्मक’’ प्रकृति के होते हैं, लेकिन उन्हें केवल सामान्य राय मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

अदालत ने कहा कि मानवाधिकारों की रक्षा के लिए गठित विशेषज्ञ वैधानिक संस्था द्वारा की गई जांच के आधार पर जारी एनएचआरसी की सिफारिशों का महत्वपूर्ण प्रभाव और महत्व होता है।

भाषा रवि कांत रवि कांत पारुल

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