वर्ष 2020 के प्रदर्शन में पंजाब के मुख्यमंत्री मान पर भीड़ को उकसाने का कोई आरोप नहीं : उच्चतम न्यायालय

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वर्ष 2020 के प्रदर्शन में पंजाब के मुख्यमंत्री मान पर भीड़ को उकसाने का कोई आरोप नहीं : उच्चतम न्यायालय

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  • Publish Date - July 21, 2026 / 04:18 PM IST,
    Updated On - July 21, 2026 / 04:18 PM IST

नयी दिल्ली, 21 जुलाई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को मौखिक रूप से कहा कि वर्ष 2020 में चंडीगढ़ में बिजली दरों में वृद्धि के खिलाफ हुए प्रदर्शन के मामले में पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान सहित आरोपियों के खिलाफ भीड़ को ‘‘उकसाने’’ का कोई आरोप नहीं है।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने चंडीगढ़ प्रशासन की अपील पर सुनवाई के लिए 30 जुलाई की तारीख निर्धारित की।

अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस. वी. राजू के माध्यम से पेश हुए चंडीगढ़ प्रशासन ने पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें इस मामले में मान और अन्य के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को रद्द कर दिया गया था।

पीठ प्रदर्शन मार्च से जुड़े मामले में प्राथमिकी और आरोपपत्र रद्द करने के उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली प्रशासन की याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बागची ने पूछा कि केवल मान और अन्य की मौजूदगी को आपराधिक साजिश रचने का आधार कैसे माना जा सकता है। पीठ ने कहा, ‘‘उनके (मान) खिलाफ भीड़ को उकसाने का कोई आरोप नहीं है।’’

इस पर विधि अधिकारी ने कहा कि प्रदर्शनकारियों को उकसाने के पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं। प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि पीठ इन याचिकाओं पर 30 जुलाई को सुनवाई करेगी, जिस दिन प्रशासन की दूसरी याचिका भी सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है।

इससे पहले पीठ ने कहा था कि वह बिजली दरों में वृद्धि के खिलाफ वर्ष 2020 के प्रदर्शन से जुड़े मामले में मान और आम आदमी पार्टी (आप) के अन्य नेताओं के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी रद्द करने के उच्च न्यायालय के फैसले में हस्तक्षेप करने के पक्ष में नहीं है।

प्रधान न्यायाधीश ने तब कहा था, ‘‘लोकतंत्र में हर कोई नारेबाजी करता है। अब जबकि वह (मान) एक जिम्मेदार पद पर हैं, हमें विश्वास है कि वह अपनी जिम्मेदारी भी समझेंगे।’’

उन्होंने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस. वी. राजू से कहा था, ‘‘यदि आप मामले के गुण-दोष के आधार पर बहस करना चाहते हैं तो हम सुनेंगे, अन्यथा हम हस्तक्षेप करने के इच्छुक नहीं हैं।’’

उच्च न्यायालय ने इससे पहले कहा था कि ‘आप’ नेताओं के खिलाफ प्रथम दृष्टया कोई मामला नहीं बनता और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की जिन धाराओं के तहत आरोप लगाए गए हैं, उनके आवश्यक तत्व इस मामले में मौजूद नहीं हैं।

अदालत ने इसके साथ ही आईपीसी की धारा 147 (दंगा), 149 (गैरकानूनी जमावड़ा), 332 (लोक सेवक को कर्तव्य पालन से रोकने के लिए स्वेच्छा से चोट पहुंचाना) और 353 (लोक सेवक को कर्तव्य निर्वहन से रोकने के लिए हमला या आपराधिक बल का प्रयोग) के तहत दर्ज प्राथमिकी और आरोपपत्र को रद्द कर दिया था।

यह प्राथमिकी वर्ष 2020 में कांस्टेबल मनप्रीत कौर की शिकायत पर दर्ज की गई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि बिजली दरों में वृद्धि के विरोध में ‘आप’ के प्रदर्शन के दौरान पार्टी के वरिष्ठ नेताओं भगवंत मान, हरपाल सिंह चीमा, गुरमीत सिंह मीत हेयर, बलजिंदर कौर, अमन अरोड़ा और अन्य ने करीब 750-800 कार्यकर्ताओं को पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह के सेक्टर-2 स्थित आवास की ओर मार्च करने के लिए उकसाया था।

पुलिस के अनुसार, प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड तोड़ने का प्रयास किया और भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पानी की बौछार किए जाने के बाद पथराव किया, जिससे कई पुलिसकर्मियों को साधारण चोटें आईं।

भाषा अमित पवनेश

पवनेश