गुवाहाटी, 14 जुलाई (भाषा) प्रख्यात साहित्यकार, अनुवादक और शिक्षाविद तथा पद्मश्री से सम्मानित गीता उपाध्याय का उम्र संबंधी बीमारियों के कारण तेजपुर में निधन हो गया।
वह 87 वर्ष की थीं।
वह एक सामाजिक कार्यकर्ता थीं और असम की पहली गोरखा महिला थीं जिन्होंने स्नातकोत्तर डिग्री हासिल की थी। वह गोरखा समुदाय के अखिल भारतीय संगठन भारतीय गोरखा परिसंघ (बीजीपी) की असम इकाई की संस्थापक अध्यक्ष भी थीं।
उपाध्याय को तेजपुर के एक निजी अस्पताल में कुछ समय के लिए भर्ती कराया गया था और स्वस्थ होने के बाद वह सोमवार दोपहर घर लौट आई थीं। हालांकि, इसके कुछ ही समय बाद उनकी तबीयत फिर बिगड़ गई और रात करीब नौ बजे उनका निधन हो गया।
मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में कहा, ‘असमिया और नेपाली साहित्य में उल्लेखनीय योगदान देने वाली प्रख्यात शिक्षाविद और लेखिका श्रीमती गीता उपाध्याय के निधन से मुझे गहरा दुख हुआ है।’
उन्होंने कहा, ‘पद्मश्री और 2026 के सती साधनी पुरस्कार से सम्मानित गीता उपाध्याय की विरासत आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।’
शर्मा ने कहा, ‘इस दुख की घड़ी में उनके परिवार, प्रशंसकों और शुभचिंतकों के प्रति मेरी हार्दिक संवेदनाएं हैं। दिवंगत आत्मा की सद्गति के लिए प्रार्थना करता हूं।’
बीजीपी, असम के महासचिव नंदा किराती देवान ने कहा कि उपाध्याय के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए संगठन ने मंगलवार से एक सप्ताह के शोक की घोषणा की है।
14 फरवरी, 1939 को असम के तत्कालीन दरांग ज़िले (अब विश्वनाथ ज़िला) के गंगमौथान में जन्मीं उपाध्याय एक प्रतिष्ठित परिवार से थीं।
वह स्वतंत्रता सेनानी छबीलाल उपाध्याय की पोती थीं जो असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पहले (चयनित) अध्यक्ष भी थे।
उन्होंने 2012 में ‘करेन्गोर लिगिरी’ का असमिया से नेपाली में ‘दरबारी सुसारे’ के रूप में अनुवाद करने के लिए साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कार जीता।
2016 में, उपाध्याय ने अपने दादाजी के जीवन पर आधारित नेपाली उपन्यास ‘जन्मभूमि मेरो स्वदेश’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार जीता था।
भाषा तान्या नरेश
नरेश